सरकारी पैसे से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की है तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी संस्थानों में कम फीस या अनुदानित दर पर PG मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टरों के लिए सेवा बॉन्ड को लेकर स्थिति साफ कर दी है।

UP News : सरकारी संस्थानों में कम फीस या अनुदानित दर पर पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टरों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि *सिर्फ इस वजह से अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड की जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉक्टर को तय समय में पोस्टिंग नहीं मिली। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि सरकारी संस्थानों में अनुदानित दर पर मेडिकल की पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को दाखिले के समय स्वीकार किए गए सेवा बॉन्ड की शर्तों का पालन करना होगा। अदालत के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना और मरीजों को समय पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य है। UP News
यह मामला लखनऊ के संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SGPGI) से MD की पढ़ाई पूरी करने वाली डॉक्टर अपरूपा सेन गुप्ता की याचिका से जुड़ा है। डॉक्टर ने ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में MD की पढ़ाई पूरी की थी। उनकी दलील थी कि कोर्स पूरा होने के तीन महीने के भीतर सरकार ने उन्हें पोस्टिंग नहीं दी। इसलिए उनका दो साल का अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड खत्म माना जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके तहत तीन महीने के भीतर पोस्टिंग नहीं मिलने पर डॉक्टर अपने आप सेवा बॉन्ड की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए। UP News
अदालत ने कहा कि अनिवार्य सरकारी सेवा की शर्त का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता बनाए रखना है। कोर्ट के अनुसार, सरकारी संस्थानों में कम लागत पर मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टरों से सेवा लेने की व्यवस्था का संबंध मरीजों को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने से भी है। इसलिए केवल प्रशासनिक देरी के आधार पर सेवा बॉन्ड खत्म नहीं माना जा सकता। UP News
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी देखा कि डॉक्टर ने आगे PDCC कोर्स करने के लिए सरकार से *अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC)* लिया था। इस NOC में स्पष्ट किया गया था कि आगे के कोर्स के दौरान बिताया गया समय सरकारी सेवा बॉन्ड की अवधि में शामिल नहीं किया जाएगा। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर भी सेवा बॉन्ड से स्वत: मुक्ति वाली दलील को स्वीकार नहीं किया। UP News
मामले में हाईकोर्ट ने डॉक्टर को पूरी तरह राहत से वंचित भी नहीं किया। अदालत ने पाया कि जिस काउंसलिंग के जरिए डॉक्टरों को अनिवार्य सरकारी सेवा के लिए स्थान आवंटित किया जा रहा था, उसमें डॉक्टर अपरूपा सेन गुप्ता को उचित मौका नहीं मिला था। 1 जून 2026 की काउंसलिंग अधिसूचना 2022 बैच के MD/MS और 2023 बैच के डिप्लोमा अभ्यर्थियों से संबंधित थी, जबकि याचिकाकर्ता *2021 बैच* की थीं। UP News
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशक को निर्देश दिया है कि डॉक्टर के लिए नई काउंसलिंग कराई जाए। इस काउंसलिंग में उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेजों और नेशनल मेडिकल कमीशन से मान्यता प्राप्त संस्थानों में उपलब्ध खाली पदों में से अपनी पसंद की जगह चुनने का अवसर दिया जाएगा। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह प्रक्रिया *27 सितंबर 2026 से चार सप्ताह के भीतर* पूरी करने का निर्देश दिया है। UP News
हाईकोर्ट ने डॉक्टर द्वारा SGPGI में सीनियर रेजिडेंट के तौर पर की गई *89 दिन की सेवा* को भी दो साल की अनिवार्य सरकारी सेवा अवधि में समायोजित करने का आदेश दिया है। नई काउंसलिंग पूरी होने तक डॉक्टर SGPGI में सीनियर रेजिडेंट के पद पर काम करती रहेंगी। UP News
सरकारी मेडिकल संस्थानों में PG मेडिकल शिक्षा के दौरान कई मामलों में सेवा बॉन्ड की शर्त लागू होती है। संबंधित बॉन्ड की राशि विशेषज्ञता और नियमों के अनुसार काफी अधिक हो सकती है। हाईकोर्ट के इस आदेश का सीधा संदेश यह है कि *सिर्फ पोस्टिंग में प्रशासनिक देरी को आधार बनाकर डॉक्टर सेवा बॉन्ड से स्वत: मुक्त होने का दावा नहीं कर सकते।* हालांकि जहां काउंसलिंग या प्रक्रिया में डॉक्टर को उचित अवसर नहीं मिला हो, वहां अदालत ने प्रशासन को प्रक्रिया दोबारा पूरी करने का निर्देश दिया है। UP News
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश एक तरफ सरकारी संस्थानों से PG मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टरों की सेवा बॉन्ड संबंधी जिम्मेदारी को स्पष्ट करता है, वहीं दूसरी तरफ सरकार को यह भी याद दिलाता है कि अनिवार्य सेवा के लिए डॉक्टरों को उचित प्रक्रिया के तहत काउंसलिंग का अवसर मिलना चाहिए। इस मामले में डॉक्टर की बॉन्ड संबंधी जिम्मेदारी बरकरार रखी गई है, लेकिन उन्हें दो साल की सेवा पूरी करने के लिए दोबारा काउंसलिंग में विकल्प चुनने का अवसर दिया गया है। साथ ही पहले की गई 89 दिन की सेवा को भी निर्धारित अवधि में समायोजित करने का आदेश दिया गया है। UP News
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