इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार और तथाकथित "बुलडोजर न्याय" (Bulldozer Justice) से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद सख्त टिप्पणियां करते हुए कहा है कि देश में भ्रष्टाचार अब इस कदर सामान्य हो गया है कि लोग इसे गलत तब तक नहीं मानते, जब तक कोई पकड़ा न जाए।

UP News : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार और तथाकथित "बुलडोजर न्याय" (Bulldozer Justice) से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद सख्त टिप्पणियां करते हुए कहा है कि देश में भ्रष्टाचार अब इस कदर सामान्य हो गया है कि लोग इसे गलत तब तक नहीं मानते, जब तक कोई पकड़ा न जाए। अदालत ने अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद का जिक्र करते हुए कहा कि यदि इतने पवित्र धार्मिक स्थल पर श्रद्धालुओं के दान में कथित गड़बड़ी भी समाज को शर्मिंदा नहीं कर सकती, तो यह ईमानदारी के सबसे निचले स्तर का संकेत है।
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यह टिप्पणियां इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने एक 51 पृष्ठों के निर्णय में दर्ज कीं। यह फैसला बुलडोजर कार्रवाई और आरोपियों के मकानों को नगर निकाय नियमों के उल्लंघन के आधार पर ध्वस्त किए जाने से जुड़े मामले में आया। इस खंडपीठ में जस्टिस सिद्धार्थनंद भी शामिल थे, जिन्होंने कुछ बिंदुओं पर अलग राय व्यक्त की।
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जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना चाहती है, तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन कर गंभीर मामलों में दोषियों के लिए मृत्युदंड जैसे प्रावधान पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार देश की संस्थाओं और व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रहा है और अब केवल सामान्य दंड से इस समस्या का समाधान संभव नहीं दिखता। हालांकि यह अदालत का सुझाव है, कोई न्यायिक आदेश नहीं। कानून में ऐसा कोई प्रावधान फिलहाल मौजूद नहीं है।
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अपने फैसले में जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी का विवाद "ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका" साबित हुआ। उन्होंने टिप्पणी की कि यदि इतने संवेदनशील धार्मिक स्थल पर श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित चोरी की घटना भी लोगों को विचलित नहीं करती, तो यह भारतीय समाज में ईमानदारी के गिरते स्तर का गंभीर संकेत है। अदालत ने यह भी कहा कि भारत का ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 रिपोर्ट में 182 देशों में 91वें स्थान पर होना भी समाज को शर्मिंदा नहीं करता।
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हाईकोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण रातों-रात नहीं खड़े हो जाते। नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों के कुछ अधिकारी राजनीतिक संरक्षण या रिश्वत के कारण आंखें मूंद लेते हैं। बाद में जब कार्रवाई होती है तो सबसे अधिक नुकसान उन आम लोगों को उठाना पड़ता है जिन्होंने ईमानदारी से मकान खरीदा होता है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल बिल्डरों ही नहीं, बल्कि भ्रष्ट अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। फैसले में अदालत ने कहा कि व्यापक भ्रष्टाचार के कारण अवैध रूप से संपत्ति कुछ लोगों के हाथों में सिमटती जा रही है। इससे अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। यदि समय रहते इस पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई तो भविष्य में सामाजिक असंतोष और गंभीर परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
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जस्टिस श्रीधरन ने अपने फैसले में सुझाव दिया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद उसके मकान को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में एफआईआर के बाद दो वर्ष तक ऐसी कार्रवाई से बचा जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से किसी मकान में रह रहा है तो ध्वस्तीकरण से पहले पर्याप्त नोटिस और वैकल्पिक व्यवस्था का अवसर मिलना चाहिए। हालांकि इन सुझावों से जस्टिस सिद्धार्थनंद सहमत नहीं थे और उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट इस प्रकार की निश्चित समय-सीमा तय नहीं कर सकता।
उधर, राम मंदिर चढ़ावा गड़बड़ी मामले की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी निगरानी कर रहा है। हाल ही में शीर्ष अदालत ने मामले की जांच को लेकर विशेष जांच दल (SIT) की भूमिका और जांच प्रक्रिया पर निर्देश दिए हैं तथा पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
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