इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस स्थिति को बेहद गंभीर स्थिति बताते हुए उत्तर प्रदेश के जिलों में तैनात जिला जजों को कड़ी चेतावनी दी है। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट (इलाहाबाद हाईकोर्ट) के द्वारा जिला जजों को चेतावनी देने का यह मामला चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।

UP News : उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट ने प्रदेशा के जिला जजों के प्रति गहरी नाराजगी जताई है। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट ने जिला जजों के प्रति नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि कानून के रखवाले ही कानून को तोड़ने का काम कर रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस स्थिति को बेहद गंभीर स्थिति बताते हुए उत्तर प्रदेश के जिलों में तैनात जिला जजों को कड़ी चेतावनी दी है। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट (इलाहाबाद हाईकोर्ट) के द्वारा जिला जजों को चेतावनी देने का यह मामला चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी अदालत यानी हाईकोर्ट का नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश की अदालतों में ज्यादातर मामलों में आरोप तय करने में बड़ी देरी की जा रही है। आरोप तय करने में देरी कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। इतना ही नहीं जिला जजों ने हाईकोर्ट के द्वारा मांगी गई जानकारी भी आधी-अधूरी उपलब्ध कराई है। उत्तर प्रदेश ने इस पूरी स्थिति को न्यायिक अनुशासनहीनता की संज्ञा देते हुए तुरन्त पूरी जानकारी देने के निर्देश जारी किए हैं। इस प्रकार के निर्देश न्यायमूति विनोद दिवाकर ने जारी किए हैं। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा है कि जिला जजों का व्यवहार न्याय व्यवस्था की बुनियाद को हिलाने वाला व्यवहार है।
दरअसल उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट में तैनात न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने 16 दिसंबर 2025 को प्रदेश के सभी जिला जजों को एक सप्ताह के भीतर ऐसी चार्जशीट की वर्षवार जानकारी देने का निर्देश दिया था, जिनमें वर्ष 2004 से 2024 तक आरोप तय नहीं हुए हैं। प्रत्येक आपराधिक न्यायालय से अलग-अलग आंकड़े देने को कहा गया था। कोर्ट को 75 में से 49 जिलों से रिपोर्ट प्राप्त हुई। गोंडा और बरेली ने समय विस्तार मांगा। 26 जिलों से कोई रिपोर्ट नहीं आई और न ही समय बढ़ाने का अनुरोध किया गया। इस पर न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा कि यह आचरण प्रथमदृष्टया गंभीर है, हालांकि बड़े संस्थागत हित में एक सप्ताह का अंतिम अवसर दिया जाता है। कोर्ट ने पाया कि हमीरपुर, मथुरा, बांदा, अमरोहा, हापुड़, पीलीभीत, उन्नाव, आजमगढ़, मुजफ्फरनगर, भदोही, सुल्तानपुर, रायबरेली और महाराजगंज की रिपोर्ट अधूरी है। साथ ही बस्ती, अंबेडकर नगर, चित्रकूट, फतेहपुर, उरई, लखनऊ, मिर्जापुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, सिद्धार्थनगर, हरदोई, औरैया, मऊ, कुशीनगर, कन्नौज, बहराइच, बलरामपुर, रामपुर, अलीगढ़, ललितपुर, संत कबीर नगर, श्रावस्ती, सीतापुर, गाजियाबाद, महोबा, गाजीपुर, लखीमपुर, कानपुर और बिजनौर की रिपोर्ट को निर्देशों की पूर्ण अवहेलना बताया। कोर्ट ने कहा कि कई जिलों ने दशकों से लंबित मामलों की कुल संख्या जानबूझकर नहीं दी गई।
आगरा, बुलंदशहर, फर्रुखाबाद और अयोध्या की रिपोर्ट को निर्देशों के अनुरूप पाया गया। विशेष रूप से आगरा के जिला जज के प्रयासों की कोर्ट ने सराहना की। कोर्ट ने उन्नाव, कुशीनगर, कन्नौज, संत कबीर नगर, श्रावस्ती, सीतापुर, गाजियाबाद और हापुड़ में जिला जज की बजाय ऑफिसर इंचार्ज द्वारा रिपोर्ट भेजने पर भी आपत्ति जताई। कहा कि यह लापरवाही या अवमानना है या नहीं, इस पर बाद में विचार किया जाएगा। कोर्ट ने आगरा, बुलंदशहर, फर्रुखाबाद और अयोध्या को छोडक़र अन्य सभी जिला जजों को 27 फरवरी तक निर्देश के अनुसार रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही कहा कि दूसरे जिला जजों को आगरा के जिला जज से शिक्षा लेनी चाहिए। UP News