इलाहाबाद हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी, इंटरनेट निगल रहा...
Uttar Pradesh Samachar
उत्तर प्रदेश
चेतना मंच
02 Dec 2025 04:33 AM
Uttar Pradesh Samachar: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किशोरों पर टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के गहरे और विनाशकारी प्रभाव को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि ये माध्यम आज के किशोरों की मासूमियत को बहुत कम उम्र में ही निगल रहे हैं और उनके संवेदनशील मन-मस्तिष्क पर गहरा असर डाल रहे हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार भी इन तकनीकों की अनियंत्रित प्रकृति के कारण इनके प्रभाव को नियंत्रित करने में विफल साबित हो रही है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने यह टिप्पणी एक 16 वर्षीय किशोर द्वारा दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की। किशोर पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग लड़की के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाए और उस पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाए। अदालत ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि महज किसी जघन्य अपराध में शामिल होने से कोई किशोर वयस्क नहीं हो जाता।
"किशोर शिकारी नहीं मानसिक रूप से सीमित"
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आईक्यू (बुद्धिलब्धि) और मनोवैज्ञानिक परीक्षणों पर गौर करते हुए पाया कि उसका आईक्यू मात्र 66 है, जो उसे ‘सीमांत बौद्धिक क्षमता’ की श्रेणी में रखता है। सेंगुइन फॉर्म बोर्ड टेस्ट के मुताबिक, उसकी मानसिक उम्र सिर्फ 6 साल आंकी गई। अदालत ने कहा कि किशोर का सामाजिक व्यवहार भी सीमित था और शैक्षणिक प्रदर्शन खराब था। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि जघन्य अपराध के आधार पर हर किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने कहा, "निर्भया कांड एक अपवाद था न कि सामान्य नियम। किशोरों के मामले में सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।" अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पीड़िता को गर्भपात की दवा देना सिर्फ याचिकाकर्ता का निर्णय नहीं था, बल्कि इसमें अन्य दो लोग भी शामिल थे। इसके आधार पर अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि उसे अकेले जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा मुमताज अहमद नासिर खान बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) मामले में की गई टिप्पणियों से सहमति जताई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी कहा था कि टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया किशोरों के कोमल मस्तिष्क पर बुरा असर डाल रहे हैं और उनके नैतिक विकास को बिगाड़ रहे हैं। कोर्ट ने अंत में कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि तकनीक के इन माध्यमों पर न तो प्रभावी नियंत्रण है और न ही ऐसा कोई संकेत है कि सरकार निकट भविष्य में इन्हें नियंत्रित कर सकेगी। इनकी अनियंत्रित प्रकृति आज की युवा पीढ़ी के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।