उत्तर प्रदेश का एक ऐसा शहर जहां छिपा है अनदेखा खजाना, हर कोने से आते हैं सैकड़ों लोग

यह शहर अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है। यह जगह कला, संगीत और साहित्य के लिए भी प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश में स्थित इस ज्ञान नगरी को इतिहास और परंपराओं का प्रतीक माना जाता है।

Uttar Pradesh
उत्तर प्रदेश का प्राचीन शहर
locationभारत
userअसमीना
calendar28 Feb 2026 03:03 PM
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उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जो अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए पूरे भारत में जाना जाता है। उत्तर प्रदेश के शहरों में वाराणसी का नाम सबसे प्रमुख है क्योंकि यह उत्तर प्रदेश का सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक शहरों में से एक है। उत्तर प्रदेश में बसा यह शहर न केवल धर्म और संस्कृति का केंद्र है बल्कि शिक्षा और ज्ञान का भी प्रमुख स्थल माना जाता है। उत्तर प्रदेश की यह नगरी गंगा नदी के किनारे फैली हुई है और इसे दुनिया के सबसे पुराने शहरों में गिना जाता है। उत्तर प्रदेश के इतिहास और संस्कृति में वाराणसी का योगदान अतुलनीय है यही कारण है कि इसे ‘ज्ञान नगरी’ कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों की तुलना में वाराणसी ने अपनी प्राचीन परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को आज भी जीवित रखा है।

वाराणसी भारत का सबसे प्राचीन शहर

वाराणसी उत्तर प्रदेश के मध्य में गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यह शहर अपनी पुरातन सभ्यता और ऐतिहासिक धरोहर के कारण भारत और दुनिया में विशिष्ट स्थान रखता है। पुरातत्व और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, वाराणसी की उत्पत्ति हजारों साल पुरानी है। यहां मंदिर, घाट और सांस्कृतिक स्थलों की भरमार है जो शहर को जीवंत बनाते हैं। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने भी लिखा है कि वाराणसी इतिहास से पुराना और परंपराओं से भी प्राचीन है।

तीन नामों से मशहूर है वाराणसी

वाराणसी को तीन नामों से जाना जाता है। ‘वाराणसी’ गंगा की सहायक नदियों वरुणा और आसी के नाम से जुड़ा है। ‘काशी’ सर्व ज्ञान और शिक्षा की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है जबकि ‘बनारस’ शास्त्रीय संगीत और कला का केंद्र है। इन तीन नामों ने शहर की धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक पहचान को मजबूती दी है। यहां कई महान कवि, संत और विद्वान जैसे कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद और पंडित रवि शंकर ने अपने योगदान से शहर की महत्ता को और बढ़ाया।

धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत

वाराणसी को धार्मिक नगरी के रूप में भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव के प्राचीन मंदिर और गंगा नदी के घाट श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण हैं। इसे ‘मंदिरों का शहर’, ‘दीपों का शहर’ और ‘भगवान शिव की नगरी’ भी कहा जाता है। सारनाथ में गौतम बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन दिया जिससे यह बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए भी महत्वपूर्ण बन गया। इस शहर की गलियों, घाटों और मंदिरों में भारतीय संस्कृति की जीवंत झलक मिलती है।

शिक्षा और विश्वविद्यालयों का केंद्र

वाराणसी शिक्षा का भी प्रमुख केंद्र है। यहां चार बड़े विश्वविद्यालय हैं बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU), महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय। यहां के लोग मुख्य रूप से काशिका भोजपुरी बोलते हैं जो हिंदी की एक प्यारी बोली है। शिक्षा और संस्कृति के यह केंद्र शहर को भारत की बौद्धिक राजधानी बनाते हैं।

वाराणसी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक खासियत

वाराणसी की कथाएं लगभग 10,000 साल पुरानी हैं और इसे विश्व के सबसे पुराने शहरों में शामिल किया गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने यहीं रामचरितमानस लिखा और यहां शास्त्रीय संगीत का प्रमुख घराना विकसित हुआ। इसकी गलियां, घाट और मंदिर भारतीय संस्कृति का जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं और शहर को हर दृष्टि से विशिष्ट बनाते हैं।

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उत्तर प्रदेश में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, इन अधिकारियों की पोस्टिंग बदली

शासन स्तर पर जारी ताजा आदेश के तहत कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को अतिरिक्त दायित्व सौंपे गए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के इस फैसले को उत्तर प्रदेश में विकास योजनाओं, कल्याणकारी कार्यक्रमों और विभागीय कामकाज की निगरानी को तेज करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

उत्तर प्रदेश प्रशासन में री-शफल
उत्तर प्रदेश प्रशासन में री-शफल
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar28 Feb 2026 02:38 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी, जवाबदेह और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। शासन स्तर पर जारी ताजा आदेश के तहत कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को अतिरिक्त दायित्व सौंपे गए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के इस फैसले को उत्तर प्रदेश में विकास योजनाओं, कल्याणकारी कार्यक्रमों और विभागीय कामकाज की निगरानी को तेज करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। खास तौर पर खाद्य प्रसंस्करण, उद्यानिकी, पिछड़ा वर्ग कल्याण और दिव्यांगजन सशक्तिकरण जैसे विभागों में नई प्रशासनिक सक्रियता आने की उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि ये विभाग सीधे तौर पर किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हैं।

बाबू लाल मीना को खाद्य प्रसंस्करण का अतिरिक्त प्रभार

शासन के ताजा आदेश के तहत वरिष्ठ आईएएस बाबू लाल मीना को खाद्य प्रसंस्करण विभागाध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। उत्तर प्रदेश की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था को नई ताकत देने के लिए सरकार खाद्य प्रसंस्करण को अहम कड़ी मान रही है क्योंकि यही सेक्टर खेत से बाजार तक मुनाफे की चेन को मजबूत करता है। उत्तर प्रदेश सरकार का फोकस किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उपज में वैल्यू-एडिशन कराने और फूड इंडस्ट्री के लिए निवेश का माहौल तैयार करने पर है। ऐसे में मीना को यह जिम्मेदारी देना इस बात का संकेत है कि उत्तर प्रदेश में नई प्रसंस्करण इकाइयों, निवेश प्रस्तावों और स्थानीय रोजगार के अवसरों को तेज रफ्तार देने की तैयारी अब और आक्रामक मोड में जा रही है।

राजेश कुमार सिंह को सामाजिक न्याय से जुड़े विभागों की अहम जिम्मेदारी

आईएएस राजेश कुमार सिंह को पिछड़ा वर्ग कल्याण और दिव्यांगजन सशक्तिकरण से जुड़े दायित्वों का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। ये दोनों विभाग उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की रीढ़ माने जाते हैं। जहां पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग शिक्षा, छात्रवृत्ति, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं का संचालन करता है, वहीं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग विशेष जरूरतों वाले नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, पुनर्वास और रोजगार से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाता है। शासन का संकेत साफ है योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, और इसमें पारदर्शिता व समयबद्धता सुनिश्चित हो।

राजकमल यादव बने उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण में विशेष सचिव

इसी क्रम में आईएएस राजकमल यादव को उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग में विशेष सचिव नियुक्त किया गया है। उत्तर प्रदेश में बागवानी क्षेत्र (फल-सब्जी-पुष्प उत्पादन) लगातार विस्तार ले रहा है और सरकार निर्यात क्षमता बढ़ाने, कोल्ड-चेन नेटवर्क मजबूत करने तथा प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देने पर काम कर रही है। यादव की नियुक्ति को विभागीय योजनाओं के अधिक प्रभावी संचालन और नई परियोजनाओं के तेज क्रियान्वयन से जोड़कर देखा जा रहा है। UP News

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योगी सरकार का बड़ा ऐलान करीब, इन शिक्षकों की बदलेगी भुगतान व्यवस्था

नियम लागू होते ही उत्तर प्रदेश के वित्तविहीन स्कूलों में शिक्षक रखने से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया मानकों से बंधेगी, यानी स्कूल प्रबंधन की मनमर्जी की जगह अब सरकारी नियम तय करेंगे कि शिक्षक को कितना और कैसे भुगतान मिलेगा।

सीएम योगी
सीएम योगी
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar28 Feb 2026 12:06 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश में वित्तविहीन माध्यमिक स्कूलों में पढ़ाने वाले लाखों अंशकालिक शिक्षकों के लिए जल्द बड़ी खबर आ सकती है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अब इन शिक्षकों को सम्मानजनक मानदेय दिलाने के लिए बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। माध्यमिक शिक्षा विभाग एक नई नियमावली को अंतिम रूप दे रहा है, जिसमें शिक्षकों की सेवा शर्तें स्पष्ट होंगी और मानदेय को लेकर एक तय व पारदर्शी ढांचा बनाया जाएगा। नियम लागू होते ही उत्तर प्रदेश के वित्तविहीन स्कूलों में शिक्षक रखने से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया मानकों से बंधेगी, यानी स्कूल प्रबंधन की मनमर्जी की जगह अब सरकारी नियम तय करेंगे कि शिक्षक को कितना और कैसे भुगतान मिलेगा।

मानदेय पर योगी सरकार का फोकस

उत्तर प्रदेश में इस समय करीब 23 हजार वित्तविहीन माध्यमिक स्कूल संचालित हैं। इन स्कूलों में चार लाख से अधिक अंशकालिक शिक्षक छात्रों को पढ़ा रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था में इन शिक्षकों की भागीदारी को 70 से 80 प्रतिशत तक बताया जाता है। यानी उत्तर प्रदेश के माध्यमिक स्तर पर शिक्षा की बड़ी जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर है, लेकिन वर्षों से मानदेय और नियमों को लेकर स्थिति असंतोषजनक बनी हुई है। उत्तर प्रदेश सरकार ने नियमावली बनाने के लिए सचिव, माध्यमिक शिक्षा की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर दी है। कमेटी को निर्देश हैं कि वह एक माह में रिपोर्ट सौंपे। रिपोर्ट में हर बिंदु की समीक्षा कर ऐसे प्रावधान शामिल किए जाएंगे, जिससे वित्तविहीन स्कूलों में शिक्षकों के मानदेय को लेकर एक समान और पारदर्शी व्यवस्था बन सके। नियमावली जारी होते ही स्कूल प्रबंधनों की मनमर्जी पर रोक लगने की उम्मीद है।

विधानमंडल तक पहुंचा था मामला

उत्तर प्रदेश विधानमंडल में भी वित्तविहीन शिक्षकों के मानदेय का मुद्दा उठ चुका है। उस समय सरकार ने कहा था कि कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद इस दिशा में कार्रवाई की जाएगी। अब कमेटी का गठन और नियमावली तैयार करने की प्रक्रिया को उसी वादे की अगली कड़ी माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के महामंत्री राजीव यादव ने कहा है कि वित्तविहीन शिक्षकों के लिए मजबूत सेवा नियमावली बननी चाहिए और उन्हें सम्मानजनक मानदेय मिलना चाहिए। साथ ही नियमावली को जल्द जारी कर ज़मीनी स्तर पर प्रभावी तरीके से लागू किया जाए, ताकि उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में व्यवस्था एक जैसी रहे।

2001 के शासनादेश के बावजूद मानदेय में गड़बड़ी

वित्तविहीन माध्यमिक स्कूलों में अंशकालिक शिक्षकों की सेवा शर्तें 10 अगस्त 2001 को जारी शासनादेश के अनुसार तय हैं। शासनादेश में यह व्यवस्था है कि स्कूल प्रबंधन अपने संसाधनों के आधार पर भुगतान करेगा, पूरे शिक्षण सत्र में नियमित भुगतान होगा और उसका रिकॉर्ड भी रखा जाएगा। इसके अनुसार कुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी से कम मानदेय नहीं दिया जा सकता और भविष्य निधि (PF) व जीवन बीमा जैसी सुविधाओं का भी प्रावधान है। लेकिन तस्वीर यह है कि उत्तर प्रदेश के कई स्कूलों में इन नियमों का पूरा पालन नहीं हो रहा। कई जगहों पर शिक्षकों को सिर्फ 5,000 से 6,000 रुपये प्रतिमाह तक मानदेय मिलने की शिकायतें सामने आती रही हैं। UP News

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