अमेठी में महंगाई से कुम्हारों की मुश्किलें बढ़ीं। मिट्टी की ट्रॉली 700-800 रुपये में मिल रही है, जबकि 20 बर्तन बेचने पर महज 60 से 80 रुपये का मुनाफा हो रहा है।

अमेठी, उत्तर प्रदेश। महंगाई की मार ने मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कभी गांवों की पहचान और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार रही कुम्हारी कला अब मिट्टी की किल्लत, महंगे ईंधन और कम मुनाफे के बीच दम तोड़ रही है। कच्चे माल से लेकर बर्तनों को पकाने तक का खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन तैयार उत्पादों की कीमत में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हो रही। दिनभर मेहनत करने के बाद भी जब पर्याप्त कमाई नहीं होती तो परिवार का खर्च चलाने से लेकर पुश्तैनी कारोबार को आगे बढ़ाने तक की चुनौती खड़ी हो जाती है।
कुम्हारी कला में मिट्टी सबसे जरूरी कच्चा माल है, लेकिन अब इसकी उपलब्धता आसान नहीं रही। कारीगरों को तालाब से मिट्टी खरीदने के लिए एक ट्रॉली के 700 से 800 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। इसके बाद बर्तन बनाने, सुखाने और पकाने में भी मेहनत, समय और ईंधन की लागत जुड़ जाती है। बढ़ती महंगाई ने उत्पादन की लागत बढ़ा दी है, जबकि बाजार में मिट्टी के बर्तनों की कीमत से पर्याप्त मुनाफा नहीं निकल पा रहा। कारीगर राजेश प्रजापति के मुताबिक, मिट्टी की व्यवस्था करना उनके लिए बड़ी चुनौती है। उनका कहना है कि मिट्टी का पट्टा नहीं मिलने के कारण कच्चे माल की व्यवस्था करने के लिए भी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इससे कारोबार चलाना मुश्किल होता जा रहा है।
कारीगर बुद्धू कुम्हार की परेशानी इस कारोबार की वास्तविक स्थिति बयां करती है। उनके मुताबिक, थोक में 20 बर्तन बेचने पर प्रति बर्तन महज तीन से चार रुपये का मुनाफा हो पाता है। इस तरह 20 बर्तनों की बिक्री पर कुल मुनाफा लगभग 60 से 80 रुपये ही होता है। इतनी कम कमाई में परिवार का खर्च उठाना और कारोबार को आगे बढ़ाना आसान नहीं है। कारीगर राम प्रसाद के मुताबिक, इलेक्ट्रिक चाक मिलने से काम करने के तरीके में बदलाव जरूर आया है, लेकिन कच्चे माल और ईंधन का खर्च तथा तैयार बर्तनों की कम कीमत अब भी बड़ी समस्या है। वर्षों से इस पेशे में लगे कारीगर इतनी बचत भी नहीं कर पा रहे कि अपना पक्का मकान बनवा सकें।
उत्तर प्रदेश के अमेठी में कुम्हारी कला से जुड़े 910 टोले बताए गए हैं, जिनमें 824 परिवार मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते हैं। उत्तर प्रदेश खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड के अंतर्गत माटीकला बोर्ड की ओर से वित्तीय वर्ष 2019-20 से 2025-26 तक 145 निशुल्क चाक वितरित किए गए। इसके बावजूद अधिकांश कारीगर आज भी पारंपरिक हाथ के चाक से बर्तन बना रहे हैं। कई जगह बिजली आपूर्ति और तकनीकी दिक्कतों के कारण इलेक्ट्रिक चाक का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। कारीगरों का कहना है कि केवल चाक उपलब्ध करा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। मिट्टी की सुलभ उपलब्धता, बिजली और ईंधन की व्यवस्था के साथ तैयार उत्पादों का उचित मूल्य मिलना भी जरूरी है।
कारीगरों के मुताबिक, पहले तालाबों से आसानी से मिट्टी मिल जाती थी, लेकिन अब वहां से मिट्टी उपलब्ध नहीं हो पा रही है। ओवरब्रिज निर्माण के कारण भी मिट्टी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। कुछ कुम्हार पुश्तैनी खेतों से मिट्टी निकालकर किसी तरह अपना काम चला रहे हैं। मिट्टी के पट्टे और जरूरी सुविधाएं नहीं मिलने से उनका कारोबार लगातार सीमित होता जा रहा है।
जिलाधिकारी शशांक चौधरी के अनुसार, कुम्हारों के उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए उन्हें स्थानीय बाजारों, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और जिला स्तर पर आयोजित प्रदर्शनियों से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदर्शनियों में स्टॉल उपलब्ध कराकर उनके उत्पादों की मार्केटिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिला प्रशासन के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026-27 में अब तक 0.2560 हेक्टेयर भूमि का आवंटन किया गया है। इलेक्ट्रिक चाक की उपलब्धता को लेकर जिलाधिकारी ने कहा कि फिलहाल जिले में इनकी कोई कमी नहीं है। अतिरिक्त मांग आने पर शासन से चाक उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाएगी।
कुम्हारो की समस्या केवल मिट्टी या चाक तक सीमित नहीं है। बढ़ती लागत, सीमित मुनाफा और बिक्री की चुनौतियां मिलकर इस पुश्तैनी कारोबार को कमजोर कर रही हैं। जरूरत है कि कारीगरों को मिट्टी की सुलभ उपलब्धता, बिजली और ईंधन जैसी सुविधाएं देने के साथ उनके उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने की व्यवस्था हो। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो पीढ़ियों से चली आ रही कुम्हारी कला के साथ जुड़े परिवारों की आजीविका पर संकट और गहरा सकता है।
जिलाधिकारी शशांक चौधरी के अनुसार, कुम्हारों के उत्पादों की मार्केटिंग बढ़ाने के लिए स्थानीय बाजारों, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और प्रदर्शनियों से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। इलेक्ट्रिक चाक की अतिरिक्त मांग आने पर शासन से उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाएगी।
बृजेश मिश्रा
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