नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में किताबों को लेकर बड़ी अनियमितताएं सामने आई हैं। जिला प्रशासन के स्पष्ट निदेर्शों के बावजूद कई स्कूल कक्षा 8 तक एनसीईआरटी की किताबें लागू नहीं कर रहे हैं।

UP News : नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में किताबों को लेकर बड़ी अनियमितताएं सामने आई हैं। जिला प्रशासन के स्पष्ट निदेर्शों के बावजूद कई स्कूल कक्षा 8 तक एनसीईआरटी की किताबें लागू नहीं कर रहे हैं और अभिभावकों को महंगी निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
प्रशासन ने निर्देश दिया था कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर केवल एनसीईआरटी की किताबें ही लागू हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। मुरादाबाद क्षेत्र के कई स्कूलों में इन आदेशों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है, जिससे अभिभावकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन जानबूझकर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें लागू कर रहे हैं। जहां एनसीईआरटी की एक किताब 60-65 रुपये में उपलब्ध है, वहीं निजी प्रकाशकों की किताबें 250 से 700 रुपये तक में बेची जा रही हैं। एक कक्षा का पूरा सेट 3000 से 5000 रुपये तक पहुंच रहा है, जो मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए भारी खर्च साबित हो रहा है।
कई अभिभावकों ने बताया कि स्कूलों ने कुछ चुनिंदा बुक स्टॉल तय कर रखे हैं, जहां से ही किताबें खरीदना अनिवार्य किया गया है।
इन दुकानों पर न तो कोई छूट मिलती है और न ही बाहर से किताबें खरीदने की अनुमति दी जाती है, जिससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।
स्थानीय अभिभावक संगठनों के अनुसार, करीब 46 निजी स्कूल पूरी तरह निजी प्रकाशकों की किताबें लागू कर चुके हैं। वहीं 27 स्कूल ऐसे हैं जहां एनसीईआरटी के साथ अतिरिक्त निजी किताबें भी अनिवार्य कर दी गई हैं, जिससे डबल खर्च की स्थिति बन गई है। अभिभावकों का कहना है कि अगर सरकार ने एनसीईआरटी की किताबों को मान्यता दी है, तो फिर निजी किताबों को थोपने की क्या जरूरत है? कुछ अभिभावकों ने बताया कि एक ही कक्षा की किताबों की कीमत अलग-अलग स्कूलों में अलग है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह मामला प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। आदेश जारी होने के बावजूद अगर उसका पालन नहीं हो रहा, तो इससे व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मुद्दे पर सख्त कदम उठाता है या अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ यूं ही जारी रहता है।