
Atiq Ahmed News: एक समय था जब प्रयागराज में अतीक अहमद की तूती बोलती थी। उस समय अतीक अहमद ने एक महिला की साढ़े बारह बीघा जमीन पर जबरन कब्जा कर लिया था। महिला ने जब इसका विरोध किया तो रातों रात उनके पति को गायब करवा दिया। उनके भाई को कंरट लगाकर मार दिया गया। बेटे पर फायरिंग हुई और घर में घुसकर कई बार उनके परिवार को पीटा गया। अतीक और उसके आतंक से लोहा लेने वाली इस महिला का नाम है सूरजकली कुशवाहा उर्फ जयश्री।
प्रयागराज के धूमनगंज इलाके के झलवा की रहने वाली जयश्री के पति बृजमोहन कुशवाहा के पास 12 बीघा से अधिक जमीन थी। इस पर खेती होती थी जिससे परिवार का पालन- पोषण चलता था। लेकिन एक दिन सब कुछ बदल गया। जयश्री के पति गायब हो गए और जमीन पर अतीक का कब्जा हो गया।
जयश्री कहती हैं कि अतीक का करीबी लेखपाल एक दिन उनके पास आया और बताया कि आपकी जमीन शिवकोटी सहकारी आवास समिति के नाम पर दर्ज हो गई है। अतीक ने इसमें दो लोगों को सचिव बनाया और इस जमीन को बेचना शुरू कर दिया।
जयश्री ने बताया ने कि जब उसने इसका विरोध किया तो अतीक ने उन्हें और उनके परिवार को धमकाना शुरू कर दिया। जमीन को कब्जा हए देख जयश्री ने गांव वालों की सहायता मांगी और अपनी जमीन वापस पाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जयश्री ने बताया कि अतीक ने उन्हें अपने ऑफिस बुलाकर ले- देकर मामला शांत करने को कहा। लेकिन उन्होंने अतीक के ऑफर को ठुकरा दिया था। इसके बाद अतीक के गुर्गों ने कई बार घर में घुसकर उनके साथ मारपीट की। उसके गुर्गे उन्हें लगातार धमकी देते रहे। जय श्री बिना डरे अतीक से मुकाबला किया।
जयश्री अपने भाई प्रह्लाद कुशवाहा की करेंट लगने से हुई मौत के लिए भी अतीक अहमद को जिम्मेदार ठहराती हैं। उनका कहना है कि बीते 30 सालों में उनपर 7 बार हमला हुआ। साल 2016 में उनके घर के सामने बेटे और परिवार पर हमला हुआ। इसमें उनके बेटे को गोली लगी थी। लेकिन, बेटे की जान बच गई।
जयश्री के अनुसार वह कई सालों तक कोर्ट और थाने के चक्कर काटती रहीं। लेकिन, अतीक के खिलाफ कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही थी। थाने में एफआईआर तक नहीं लिखी जा रही थी। साल 1991 में उन्हें अतीक के खिलाफ पहली एफआईआर करवाने में कामयाबी हासिल हुई। साल 2001 में आरोपों को निराधार बताकर केस बंद कर दिया गया।
साल 2007 में प्रदेश में जब बसपा की सरकार बनी तब जयश्री को एक बड़ी सफलता मिली। जमीन की कार्बन सेलिंग रसीद नहीं मिलने के चलते सहकारी आवास समिति के नामांतर को निरस्त कर दिया गया और जमीन को उनके नाम दर्ज कराया गया। मामले में जांच हुई और 2005 में तहसीलदार का फर्जीवाड़ा सामने आया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।