अयोध्या गोलीकांड की 36वीं बरसी पर याद आया 2 नवंबर 1990 का दर्दनाक दिन। भजन-कीर्तन करते कारसेवकों पर चली थीं गोलियां, प्रत्यक्षदर्शियों ने सुनाई उस दिन की आंखों देखी कहानी। पढ़े पूरी खबर।

UP News:अयोध्या की गलियों में आज रामधुन गूंजती है, रामलला के भव्य मंदिर में लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं और पूरी रामनगरी भक्ति के रंग में रंगी नजर आती है। लेकिन इसी अयोध्या की कुछ गलियां ऐसी भी हैं, जिनकी मिट्टी में एक दर्दनाक इतिहास दफन है। यह वही गलियां हैं, जहां कभी राम मंदिर निर्माण का संकल्प लेकर निकले कारसेवकों पर गोलियां बरसाई गई थीं। जहां भजन-कीर्तन और रामनाम के जयघोष के बीच अचानक गोलियों की आवाज गूंजने लगी थी। जहां अपनों को तलाशती आंखें, घायलों की चीखें और चारों ओर मची भगदड़ ने रामनगरी को दहला दिया था। आज 2 नवंबर है। वर्ष 1990 में इसी दिन अयोध्या में हुए गोलीकांड की बरसी है। 36 वर्ष बाद भी उस दिन की यादें राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के दिलों में ताजा हैं। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में आज भले ही भव्य राम मंदिर स्थापित हो चुका है, लेकिन इस मंदिर तक पहुंचने का संघर्ष लंबा और पीड़ादायक रहा है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान हजारों रामभक्तों और कारसेवकों ने आंदोलन में भाग लिया। इस संघर्ष के दौरान अनेक लोगों ने अपनी जान गंवाई। 2 नवंबर 1990 का गोलीकांड इसी संघर्ष का सबसे दर्दनाक अध्याय माना जाता है। UP News
2 नवंबर 1990 को कार्तिक पूर्णिमा का दिन था। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर कारसेवक जुटे हुए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने कारसेवा रोकने के लिए अयोध्या में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। जगह-जगह बैरिकेडिंग की गई थी और सुरक्षा बल तैनात थे। इसके बावजूद राम मंदिर निर्माण का संकल्प लेकर पहुंचे कारसेवकों के कदम नहीं रुके। कारसेवकों ने उस दिन कीर्तन सत्याग्रह का निर्णय लिया। योजना थी कि निहत्थे कारसेवक भजन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ेंगे। उनके हाथ ऊपर होंगे और तालियां बजाते हुए रामनाम का संकीर्तन किया जाएगा। हनुमानगढ़ी से रामलला की ओर बढ़ते कारसेवकों की टोलियों में भजन और जयकारे गूंज रहे थे। इसी दौरान हालात अचानक बिगड़ गए और गोलीबारी शुरू हो गई। देखते ही देखते अयोध्या की संकरी गलियों में भगदड़ मच गई। लोग अपने साथियों और परिजनों को तलाशने लगे। राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों के मुताबिक, उस दिन की गोलीबारी ने पूरे आंदोलन को झकझोर कर रख दिया था।
गोलीकांड की घटनाओं को याद करते हुए महंत सुरेश दास बताते हैं कि तत्कालीन सरकार ने कारसेवा रोकने के लिए अयोध्या में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे, लेकिन राम मंदिर निर्माण के लिए आए कारसेवक पीछे हटने को तैयार नहीं थे। उनके अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन कारसेवकों ने कीर्तन सत्याग्रह का रास्ता चुना था। सभी निहत्थे होकर भजन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान कुछ कारसेवक आगे बढ़ने लगे। रामकुमार कोठारी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तभी गोली चली और वह गिर पड़े। दिगंबर अखाड़े के सामने हुई गोलीबारी की यादें आज भी उस दौर के लोगों को विचलित कर देती हैं। UP News
2 नवंबर के गोलीकांड से जुड़ी एक ऐसी घटना भी है, जिसे याद करते हुए आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। महंत विवेक आचारी बताते हैं कि गोली लगने से एक कारसेवक सड़क पर गिर पड़ा था। इसके बाद उसने अपने खून से सड़क पर 'सीताराम' लिख दिया। आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि 'सीताराम' उस कारसेवक का नाम था या फिर जीवन के अंतिम क्षणों में उसने प्रभु श्रीराम का स्मरण करते हुए यह शब्द लिखा था। यह घटना अयोध्या गोलीकांड की उन मार्मिक स्मृतियों में शामिल है, जो राम मंदिर आंदोलन के दर्दनाक इतिहास को जीवंत कर देती हैं। UP News
राम मंदिर आंदोलन से जुड़े शरद शर्मा भी उस दिन की घटनाओं को याद करते हुए बताते हैं कि वह 30-40 युवाओं के साथ भजन-कीर्तन करते हुए राम मंदिर की ओर निकले थे। उस समय अयोध्या की गलियों में 'अपना-अपना लाल चढ़ा दो, मंदिर का निर्माण करा दो' जैसे नारे गूंज रहे थे। चारों ओर बैरिकेडिंग की गई थी। वह अपने साथियों के साथ प्रह्लाद घाट तक पहुंच गए थे, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके मुताबिक, उस समय अयोध्या का वातावरण पूरी तरह राम मंदिर आंदोलन के नारों और भजनों से गूंज रहा था। लेकिन इसी माहौल के बीच हुई गोलीबारी ने आंदोलन से जुड़े लोगों को गहरे सदमे में डाल दिया। UP News
आज अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु रामलला के दर्शन करने पहुंच रहे हैं। जिन गलियों में कभी कारसेवकों के कदमों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की गई थी, उन्हीं रास्तों से आज श्रद्धालुओं की टोलियां रामनाम का संकीर्तन करती हुई गुजरती हैं। समय ने अयोध्या की तस्वीर बदल दी है। राम मंदिर निर्माण का सपना साकार हो चुका है, लेकिन 2 नवंबर 1990 का वह दिन इतिहास के पन्नों में हमेशा दर्ज रहेगा। हर वर्ष 2 नवंबर को राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोग और रामभक्त उन कारसेवकों को याद करते हैं, जिन्होंने मंदिर निर्माण के संकल्प के लिए संघर्ष किया और अपनी जान गंवाई। उनके परिजनों और आंदोलन के प्रत्यक्षदर्शियों के लिए यह तारीख केवल कैलेंडर का एक दिन नहीं, बल्कि अपनों को खोने की पीड़ा और अधूरे संघर्षों की याद दिलाने वाला दिन है।UP News
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