Ayodhya Ram Mandir : अयोध्या के राम मंदिर का एक ऐसा सच जो आपने न कहीं पढ़ा होगा ना सुना होगा, आपको जरूर जानना चाहिए
Ayodhya Ram Mandir
भारत
चेतना मंच
09 Nov 2022 05:22 PM
- मनोज रघुवंशी
Ayodhya Ram Mandir : आज ही के दिन की बात है, जब आज से ठीक 33 साल पहले 9 नवम्बर, 1989 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का शिलान्यास होना निश्चित हुआ था। लेकिन, सस्पेंस था कि शिलान्यास हो पायेगा या नहीं? ‘विश्व हिन्दू परिषद’ ने ऐलान किया था कि हर हाल में शिलान्यास होगा, और वहीं होगा, जहां पर अंततः श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का सिंह द्वार बनेगा।
राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री। कांग्रेस का ये कहना था कि जिस स्थल पर शिलान्यास प्रस्तावित है, वो स्थल ‘विवादित’ है, इसलिए शिलान्यास की अनुमति वहां नहीं दी जा सकती। ‘विश्व हिन्दू परिषद’ का वचन था कि हम तो शिलान्यास वहीं करेंगे। अगर किसी में ताकत है तो रोक के दिखाए।
Ayodhya Ram Mandir :
इस गहमा-गहमी के बीच राजीव गांधी के केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह ने एक खबर लीक कर दी कि ‘विश्व हिन्दू परिषद’ ने अभी-अभी ये तय किया है कि शिलान्यास की ‘तारीख’ बदल दी जायेगी। विश्व हिन्दू परिषद ने प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। बहुत से पत्रकार ये देखने के लिए पहुंचे कि अब ‘विश्व हिन्दू परिषद’ की सरेआम फजीहत होगी। लेकिन हुआ उलटा। ‘विश्व हिन्दू परिषद’ ने ऐलान किया कि हम न तो तारीख बदलेंगे, न समय, न स्थान। पत्रकारों की भीड़ बड़ी थी, इसलिए कवरेज भी बड़ी मिली।
फिर कुछ दिनों के बाद बूटा सिंह ने एक खबर और लीक कर दी कि अभी-अभी ‘विश्व हिन्दू परिषद’ ने ये मान लिया है कि वो ‘स्थान’ बदल देंगे। ‘विश्व हिन्दू परिषद’ ने एक बार फिर से प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस बार पत्रकारों का हुजूम पहले से बहुत ज्यादा बड़ा था। अबकी बार तो बहुत से पत्रकार मन बनाकर आये थे कि आज तो विश्व हिन्दू परिषद के धराशायी होने का दृश्य कवर करके ही जाएंगे। लेकिन हुआ फिर उलटा। अबकी बार दोबारा विश्व हिन्दू परिषद ने डंके की चोट पर ये वादा किया कि हम न तो स्थान बदलेंगे, न दिन, न समय। हुजूम बहुत ज्यादा बड़ा था, इसलिए कवरेज भी धमाकेदार हुई।
आगे की बात बताने से पहले मैं उस समय का माहौल समझाना चाहूंगा:
उस साल जुलाई में हिमाचल प्रदेश में भाजपा ने ये घोषणा की थी कि पार्टी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। मतलब जैसे कांग्रेस ने सोमनाथ का मंदिर बनवाया था, वैसे ही। इस फैसले से एक महत्वपूर्ण बदलाव आया था। अभी तक जो विषय केवल धार्मिक था, और केवल विश्व हिन्दू परिषद तक सीमित था, वो विषय अब राजनैतिक भी बन चुका था। यानी विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ के साथ-साथ भाजपा के कार्यकर्ता अब खुलेआम पूरी ताकत से इस विषय पर जमीन पर काम करने वाले थे।
इसी दौरान विश्व हिन्दू परिषद ने एक देशव्यापी अभियान चलाया। उसने लाखों गांवों में शिला पूजन कार्यक्रम किये। इन आयोजनों में शिलाओं (ईंटों) की पूजा की गयी और लोगों ने यथा-शक्ति चढ़ावा भी चढ़ाया। ये संकल्प लिया गया कि ये शिलायें श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में लगाई जाएंगी। नतीजा ये कि भारत में करोड़ों लोगों की इच्छाशक्ति भी मंदिर आंदोलन में जुट गयी।
राजीव गांधी की कुर्सी तो ढाई साल पहले से ही हिलना शुरू हो चुकी थी। उन पर आरोप लग रहे थे कि उन्होंने रक्षा सौदों में दलाली ली है। उनके बार-बार बदलते स्टैंड की वजह से आरोप गंभीर रूप धारण करने लगे थे। नवम्बर 1989 का महीना राजीव गांधी की सत्ता का आखिरी महीना था। इसी महीने लोकसभा के चुनाव होने थे। ऐसे में अयोध्या विषय के कारण करोड़ों लोगों का एकदम से राजीव गांधी से विमुख हो जाना उनके लिए बहुत बड़ा राजनैतिक खतरा था।
इन सारे कारणों के साथ-साथ नवम्बर 1989 में एक बड़ा कारण और था। इस चुनाव में जनता दल, भाजपा, वामपंथी दलों जैसी अलग-अलग पार्टियों ने मिलकर ये फैसला किया था कि कांग्रेस के खिलाफ उनका सिर्फ एक प्रत्याशी होगा। ये नुस्खा 1977 के फॉर्मूले से फर्क था। चुनाव-1977 के समय पर इन पार्टियों के तत्कालीन स्वरूपों ने मिलकर जनता पार्टी बनायी थी, जिसको इंदिरा गांधी के आपातकाल के खिलाफ नाराजगी का भयंकर फायदा मिला था। और, जनता पार्टी केंद्र की सत्ता में आ गयी थी। केंद्र में ये भारत की पहली गैर-कांग्रेस सरकार थी। उस चुनाव में इंदिराजी रायबरेली से खुद चुनाव हार गयी थीं, और संजय गांधी अमेठी की अपनी सीट हार गए थे। उस जनता पार्टी के टूटने का एक कारण ये था कि जनसंघ (यानी वर्तमान की भाजपा) ने ये बात मानने से इंकार कर दिया था कि उनके सदस्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य नहीं रहेंगे। उस 1977 के तजुर्बे से इन दलों ने ये सीखा था कि सब दलों का एक बैनर के नीचे विलय होना व्यावहारिक नहीं है। इस वजह से 1989 के चुनाव में ये फार्मूला लागू किया गया कि आपस में ये तय कर लिया जायगा कि कौन सी सीट किस पार्टी को दी गयी, और उस सीट पर विपक्ष का केवल वही एक प्रत्याशी खड़ा होगा।
तात्पर्य ये कि 1989 में, नवम्बर के अंत में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए राजीव गांधी के विरुद्ध राजनैतिक मोर्चाबंदी जबरदस्त थी।
ऐसे माहौल में 9 नवम्बर, 1989 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का शिलान्यास होना था। इस विषय पर विश्व हिन्दू परिषद और कांग्रेस के बीच टकराव जगजाहिर था।
केंद्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह का पैंतरा अभी तक तो केवल उलटा ही पड़ा था:
शिलान्यास से एक दिन पहले स्थिति असमंजस वाली थी। लखनऊ से अयोध्या की ओर जाते हुए पत्रकारों को बाराबंकी पर बैरियर लगाकर रोक दिया गया था। पत्रकार हाईवे पर अटके हुए थे, और लखनऊ में एक महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी। उस बैठक में शामिल लोगों में थे तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, केंद्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह, योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ और विश्व हिन्दू परिषद के नेता-प्रवक्ता शिरीष चंद्र दीक्षित, जो कि उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक रह चुके थे।
मीटिंग में बूटा सिंह ने एक नक्शा दिखाकर बोला कि जिस स्थान पर आप लोग शिलान्यास करने जा रहे हैं, वो स्थान विवादित है, इसलिए आप लोगों को इजाजत नहीं दी जा सकती। शिरीष चंद्र दीक्षित बोले कि हम तो शिलान्यास करने जा ही रहे हैं। अगर हमारा कार्य गैरकानूनी है तो आप हमें गिरफ्तार कर लीजिये। तुरंत बूटा सिंह ने उसी नक्शे को देखकर बोला कि नहीं, नहीं, वो स्थान तो विवादित है ही नहीं। आप लोग शिलान्यास कर सकते हैं। ये फैसला होते ही बाराबंकी में लगा बैरियर हटा दिया गया, और पत्रकार फैजाबाद पहुच गए।
जो प्रत्यक्ष हुआ वो तो सबने देखा। शिलान्यास 9 नवम्बर को शुरू हुआ, और अगले दिन तक प्रक्रिया चलती रही। लेकिन 10 नवम्बर को एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। राजीव गांधी के पक्ष से दबी जुबान में कहा गया कि देखा, हमने शिलान्यास करवा दिया। प्रतिकार-स्वरूप विश्व हिन्दू परिषद ने 11 नवम्बर को कहा कि शिलान्यास का मतलब अब मंदिर निर्माण शुरू होना चाहिए। और अयोध्या में पांच हजार गेरुये वस्त्रधारी कन्धों पर फावड़े लेकर मंदिर निर्माण के लिए निकल पड़े। राजीव गांधी इसके लिए तैयार नहीं थे। उनके, यानी कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के प्रशासन ने, ‘कार सेवकों’ को रोक दिया।
शिलान्यास की रात एक मुस्लिम मौलवी ने मुझसे अयोध्या में कहा कि कांग्रेस ने हमको धोखा दिया है। कांग्रेस के शासनकाल में 1949 में बाबरी मस्जिद में अचानक मूर्तियां रखवाई गयी थीं, और अगले ही दिन, यानी जवाहर लाल नेहरू के समय, बाबरी मस्जिद में नमाज बंद करवा दी गयी थी। फिर 1986 में राजीव गांधी के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने हिन्दुओं के लिए ताला खुलवा दिया था। राजीव गांधी ने हमें आश्वासन दिया था कि शिलान्यास नहीं होने देंगे, लेकिन ऐन-वक्त पर एकदम से हाथ खींच लिया। एक दिन यही आदमी मंदिर बनवा देगा। हम इसको इलेक्शन में साफ कर देंगे।
हिन्दू नेताओं ने कहा कि देखो, अच्छा खासा शिलान्यास हो गया था, और हम मंदिर बनाने जा रहे थे। राजीव गांधी ने रोक दिया। हम इसको इलेक्शन में साफ कर देंगे। इलेक्शन में अब सिर्फ एक पखवाड़ा बाकी था। हिन्दुओं और मुसलामानों का घाव हरा था। रंग ले आया।
राजीव गांधी ने सोचा होगा कि शिलान्यास करवा दूंगा तो हिन्दू वोट मिल जाएगा। और मंदिर नहीं बनने दूंगा तो मुस्लिम वोट मिल जाएगा। लेकिन, हुआ ये कि जब शिलान्यास हुआ तो मुस्लिम वोट कट गया। और जब मंदिर रुका तो हिन्दू वोट कट गया।
दो नावों में सवार होना राजीव गांधी को बहुत महंगा पड़ा। उनकी सरकार चली गई। भाजपा को 1984 के चुनाव में केवल दो सीटें मिली थीं। इस चुनाव में वो बढ़कर 89 सीट हो गयी। और भाजपा के समर्थन से विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन गए, वह 11 महीने तक रहे। जब तक भाजपा ने अडवाणी जी की रथ यात्रा रोके जाने के कारण उनसे समर्थन वापस नहीं लिया।