कोर्ट ने यह भी कहा कि साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं जिससे यह साबित हो सके कि आजम खान की टिप्पणी से समाज में वैमनस्य फैलाने का इरादा था। इस आधार पर अदालत ने आजम खान को पूरी तरह बरी कर दिया।

फैसले के बाद कोर्ट से बाहर निकलते हुए आजम खान ने भावुक अंदाज में कहा कि हम खून की किस्तें तो कई दे चुके, लेकिन ऐ खाके-वतन, कर्ज़ अदा क्यों नहीं होता। उन्होंने कहा कि यह फैसला न्यायपालिका की ईमानदारी का प्रमाण है और उन्हें अपने ऊपर लगे झूठे आरोपों से राहत मिली है।
प्रदेश सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इस मामले की जांच पूरी हो चुकी है और अब निचली अदालत में दलीलों की सुनवाई की तारीख तय कर दी गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पहले ही अब्दुल्ला आजम की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि एफआईआर 2019 में दर्ज हुई, जबकि उनके शैक्षणिक दस्तावेजों और पासपोर्ट की जन्मतिथि में स्पष्ट विरोधाभास है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के अनुसार अब्दुल्ला आजम के हाई स्कूल प्रमाण पत्र में जन्मतिथि 1 जनवरी 1993 थी। जबकि पासपोर्ट में 30 सितंबर 1990 दर्ज थी। इस आधार पर अदालत ने कहा कि मामला फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से संबंधित है, इसलिए इसे रद नहीं किया जा सकता। आजम खान को आरएसएस पर टिप्पणी केस में राहत मिलना उनके लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों रूप से महत्वपूर्ण है। वहीं, उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को फर्जी दस्तावेज केस में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। यह घटनाक्रम आजम परिवार की लंबी कानूनी जद्दोजहद का हिस्सा है, क्योंकि उन पर कई मुकदमे अभी भी लंबित हैं।