
उत्तर प्रदेश की मुस्लिम सियासत का सबसे बड़ा चेहरा कहे जाने वाले समाजवादी पार्टी के महासचिव आजम खान करीब दो साल बाद जेल से बाहर आने वाले हैं। अदालत से जमानत मिलते ही उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया है और अब सीतापुर जेल के दरवाजे उनके लिए खुलने वाले हैं। जैसे ही यह खबर फैली, रामपुर की गलियों से लेकर लखनऊ के राजनीतिक गलियारों तक हलचल तेज हो गई। कहीं इसे राहत की सांस माना जा रहा है, तो कहीं इसे नई राजनीतिक पारी की आहट के तौर पर देखा जा रहा है। UP News
लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या आज़म की वापसी यूपी की सियासत का गणित बदल देगी? क्योंकि हकीकत यह है कि उनके जेल जाने के बाद रामपुर का पूरा राजनीतिक परिदृश्य बिखर गया था। कभी जहां आज़म की इजाज़त के बिना सपा का पत्ता भी नहीं हिलता था, वहीं अब उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं दिखता। ऐसे में सबकी निगाहें टिकी हैं कि आजम बाहर आकर कौन-सा सियासी दांव चलते हैं। UP News
सीतापुर जेल की सलाखों के पीछे 23 महीने बिताने के बाद हाईकोर्ट से मिली राहत ने आज़म खान की सियासी वापसी को नया मोड़ दे दिया है। रामपुर की तंग गलियों से लेकर समाजवादी पार्टी के बड़े दफ्तरों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या ‘आज़म फेक्टर’ दोबारा वही असर दिखाएगा, जो कभी रामपुर से लेकर पूरे पश्चिमी यूपी तक महसूस होता था? उनकी गैरमौजूदगी ने रामपुर की राजनीति को नीरस बना दिया था, लेकिन अब उनकी वापसी से सियासी तापमान अचानक बढ़ गया है। सबकी निगाहें इसी पर टिक गई हैं कि क्या आजम फिर से पुराने तेवर में लौटेंगे या वक्त ने उनके जलवे को कमजोर कर दिया है।
योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद आज़म खान पर कानूनी शिकंजा इस कदर कसा कि देखते ही देखते उन पर 90 से ज्यादा मुकदमों का पहाड़ खड़ा हो गया। नतीजा यह हुआ कि कभी रामपुर की राजनीति का पर्याय माने जाने वाले आजम का गढ़ बिखर गया। वह रामपुर, जहां उनकी इजाज़त के बिना टिकट तक तय नहीं होता था, अब उनके परिवार से पूरी तरह खाली है। न आज़म खुद, न उनकी पत्नी तंजीम फातिमा और न ही बेटे अब्दुल्ला किसी सदन में मौजूद हैं। इस खालीपन का फायदा उठाते हुए सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी ने अपनी जमीन मजबूत कर ली है, जबकि रामपुर विधानसभा की राजनीति पर बीजेपी और उसके सहयोगी अपना दल का असर स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
आजम खान और अखिलेश यादव के रिश्तों की कहानी हमेशा उतार-चढ़ाव से भरी रही है। 23 महीने की कैद के दौरान अखिलेश महज़ एक-दो बार ही उनसे मिलने पहुंचे, और यही दूरी सियासी गलियारों में आज़म की नाराज़गी का बड़ा संकेत मानी गई। इसी खालीपन को भुनाने के लिए शिवपाल यादव से लेकर चंद्रशेखर आज़ाद तक कई नेताओं ने उनसे नज़दीकियां बढ़ाने की कोशिश की। अब असली सवाल यही है—क्या जेल से बाहर आते ही आज़म एक बार फिर सपा की साइकिल के साथ कदमताल करेंगे, या फिर यूपी की सियासत में अपने लिए एक नया रास्ता तैयार करेंगे? UP News
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोटबैंक पर आज़म खान की पकड़ हमेशा से निर्णायक रही है। यही कारण है कि दलित राजनीति के उभरते चेहरे चंद्रशेखर आज़ाद से लेकर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी तक, सभी नेता उनके प्रभाव वाले समीकरण में हिस्सेदारी की तलाश में हैं। अगर दलित-मुस्लिम गठजोड़ का नया गठबंधन आकार लेता है, तो यह यूपी की सियासत में भूचाल ला सकता है। खुद आज़म खान प्रेशर पॉलिटिक्स के ऐसे माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं, जो जेल की सलाखों के पीछे रहते हुए भी चिट्ठियों के जरिए गठबंधन से लेकर विपक्ष तक को असहज कर चुके हैं। यही वजह है कि उनकी रिहाई महज़ एक नेता की वापसी नहीं, बल्कि यूपी की राजनीति में नई सियासी घेराबंदी की दस्तक मानी जा रही है। UP News