उत्तर प्रदेश में एक गाय की अंतिम यात्रा इंसान की सगी माँ (माता जी) की तरह निकाली गई। इतना ही नहीं गाय को पालने वाले परिवार ने घोषणा की है कि वे अपनी गाय की तेरहवीं की रस्म भी इंसान की तरह से ही आयोजित करेंगे।

UP News : उत्तर प्रदेश में एक गाय की अंतिम यात्रा इंसान की सगी माँ (माता जी) की तरह निकाली गई। इतना ही नहीं गाय को पालने वाले परिवार ने घोषणा की है कि वे अपनी गाय की तेरहवीं की रस्म भी इंसान की तरह से ही आयोजित करेंगे। उत्तर प्रदेश में गाय की अंतिम यात्रा तथा अंतिम क्रिया के बाद तेरहवीं की रस्म की घोषणा चर्चा का विषय बन गई है। हर कोई गाय की अंतिम यात्रा की चर्चा कर रहा है। गाय की अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले ग्रामीण अपने आपको भाग्यशाली बता रहे हैं।
गाय की अंतिम यात्रा इंसान की अंतिम यात्रा की तरह से निकाले जाने का यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के बागपत जिले का है। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में मुकुंदपुर गाँव एक ऐतिहासिक गांव है। मुकुंदपुर गाँव में रहने वाले देवेन्द्र शर्मा के घर में 24 वर्ष से एक गाय पाली जा रही थी। देवेन्द्र शर्मा बताते हैं कि उन्होंने गाय का नाम गोरी रखा हुआ था। मंगलवार 7 अप्रैल 2026 को गोरी का निधन हो गया। गोरी के निधन के बाद उसकी अंतिम यात्रा गाँव वालों ने पूरेर विधि-विधान के साथ इंसान की अंतिम यात्रा की तरह हनकाली।
एक बहुत पुरानी कहावत है कि- ‘‘गाय हमारी माता है, जन्म-जन्म का नाता है’’। यह कहावत उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के मुकुंदपुर गाँव में पूरी तरह से सच साबित हो गई है। गोरी गाय को पालने वाले देवेन्द्र शर्मा ने अपने घर में पाली गई गाय को माता मानते हुए उस गाय की अंतिम यात्रा इंसान की अंतिम यात्रा की तरह निकाली। इस अंतिम यात्रा में पूरे मुकुंदपुर गाँव के लोग शामिल हुए। गोरी गाय का अंतिम संस्कार करने के बाद देवेन्द्र शर्मा ने घोषणा की है कि गोरी गाय की तेरहवीं की रस्म भी पूरे विधि-विधान के साथ मुकुंदपुर गाँव में उनके आवास पर आयोजित की जाएगी। तेहरवीं की रस्म में पूरे गाँव तथा बिरादरी को भोजन भी कराया जाएगा।
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के मुकुंदपुर गाँव में रहने वाले देवेन्द्र शर्मा ने बताया कि गोरी ने सिर्फ दूध नहीं दिया। उसने हमारे परिवार को पाला है। उसके दूध से तीन पीढ़ियां बड़ी हुईं- बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी के जीवन में उसका हिस्सा रहा। गोरी ने अपने जीवन में करीब डेढ़ दर्जन बछड़ों को जन्म दिया। आज उसकी संतानें सिर्फ एक घर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आसपास के गांवों और रिश्तेदारों के घरों में भी हैं। एक तरह से गोरी की मौजूदगी पूरे इलाके में है- उसकी विरासत हर उस आंगन में सांस ले रही है, जहां उसकी संतानें हैं। मुकुंदपुर के रहने वाले अरूण कुमार ने बताया कि गोरी की अंतिम यात्रा को जिस तरह से सजाया गया, वह अनोखी थी। उसकी अर्थी को फूलों से ढका गया, रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजाया गया और पूरे गांव में शोभायात्रा निकाली गई। ढोल-नगाड़ों के बीच यात्रा आगे बढ़ी, तो रास्ते में खड़े लोग फूल बरसाकर विदाई देते रहे। किसी की आंखों में आंसू थे, तो कोई चुपचाप खड़ा था, लेकिन हर चेहरे पर एक ही भाव था- सम्मान और प्रेम का भाव। यह इंसान और पशु के बीच एक गहरे रिश्ते की कहानी थी। UP News