बलिया में 9 महीने से भटक रहे पूर्णिया के रिहान को सागर सिंह राहुल ने अपने घर में पनाह दी। सोशल मीडिया और संपर्कों की मदद से परिवार तक पहुंचा और परिजन उसे लेने पहुंचे।

UP News: सरकारी योजनाओं में बेसहारा लोगों के पुनर्वास और जरूरतमंदों को सहारा देने के तमाम दावे किए जाते हैं, लेकिन कई बार जमीनी तस्वीर इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिला में सामने आया एक मामला इसी हकीकत पर सवाल खड़े कर रहा है। करीब नौ महीने से घर से दूर भटक रहा बिहार के पूर्णिया निवासी बालक मोहम्मद रिहान आखिरकार बलिया पहुंचा, जहां सरकारी मदद मिलने से पहले स्थानीय लोगों ने उसकी सुध ली। रिहान के परिजन लंबे समय से उसकी तलाश में जुटे थे। बताया गया कि गुमशुदगी के पोस्टर लगाए गए और थाने-चौकियों के चक्कर भी काटे गए, लेकिन तलाश का सिलसिला लंबा होता चला गया। करीब 500 किलोमीटर दूर बलिया में जब रिहान बेसहारा हालत में मिला तो स्थानीय लोगों ने उसे सुरक्षित करने की कोशिश शुरू की।
रिहान के बलिया में मिलने के बाद स्थानीय लोगों ने प्रशासनिक अधिकारियों तक सूचना पहुंचाने का प्रयास किया। इसी दौरान गंगा सेवा समिति से जुड़े सागर सिंह राहुल का नाम सामने आया। उन्होंने बच्चे को अपने घर में पनाह दी और दो दिन-दो रात तक परिवार के सदस्य की तरह उसकी देखभाल की। सागर सिंह ने न केवल रिहान को भोजन और सुरक्षित जगह उपलब्ध कराई, बल्कि उसके परिजनों की तलाश के लिए सोशल मीडिया और अपने निजी संपर्कों के माध्यम से प्रयास शुरू किए। बिहार पुलिस और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से संपर्क साधकर रिहान के घर तक पहुंचने की कोशिश की गई।
लगातार प्रयासों के बाद रिहान के परिवार की पहचान हो सकी। इसके बाद बिहार से उसकी नानी और बुआ बलिया पहुंचीं। करीब 500 किलोमीटर का सफर तय कर जब परिजनों ने रिहान को देखा तो भावुक हो गए। काफी समय से बिछड़े बच्चे को सामने देखकर परिजनों की आंखों से आंसू छलक पड़े। रिहान के मिलने से परिवार को बड़ी राहत मिली। स्थानीय लोगों की भूमिका ने इस पूरे घटनाक्रम को मानवीय संवेदना की मिसाल बना दिया। UP News:
इस मामले ने बलिया में बेसहारा और लावारिस लोगों के लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं पर भी सवाल खड़े किए हैं। सागर सिंह राहुल का कहना है कि उनके पास ऐसे लोगों को रखने के लिए कोई उचित शेल्टर उपलब्ध नहीं है। ऐसे में मजबूरी में उन्हें अपने घर पर ही लोगों की देखभाल करनी पड़ती है। उनके मुताबिक अब तक वह करीब 15-16 बेसहारा लोगों को उनके परिवार तक पहुंचाने में मदद कर चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि व्यक्तिगत स्तर पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी कब तक निभाई जा सकती है?
रिहान का मामला केवल एक बच्चे के परिवार से मिलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि सड़क पर बेसहारा मिलने वाले लोगों के लिए स्थानीय स्तर पर तत्काल सहायता और पुनर्वास की कितनी प्रभावी व्यवस्था मौजूद है। बेसहारा लोगों को सुरक्षित स्थान, भोजन, चिकित्सा और उनके परिवार तक पहुंचाने के लिए एक व्यवस्थित तंत्र की जरूरत है। रिहान को आखिरकार उसका परिवार मिल गया, लेकिन इस घटना ने यह सवाल जरूर छोड़ दिया है कि यदि स्थानीय लोगों और सागर सिंह राहुल जैसे मददगार सामने नहीं आते तो रिहान की मदद कौन करता? बलिया की इस घटना ने कम से कम इतना जरूर दिखाया कि जब किसी जरूरतमंद के लिए व्यवस्था कमजोर पड़ती है, तब आम लोगों की संवेदना और इंसानियत उसके लिए सबसे बड़ा सहारा बन सकती है। UP News:
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