रज़्मी की पंक्तियाँ सरल लगती हैं, लेकिन उनके भीतर समय, समाज और इंसान की मनोवृत्ति पर तीखा सवाल छिपा होता है—यही वजह है कि उनकी शायरी श्रोताओं के दिल में उतरकर देर तक याद रह जाती है।

Muzaffar Razmi : मुज़फ़्फ़र रज़्मी (तख़ल्लुस: “रज़्मी”) उर्दू शायरी की उस परंपरा के अहम नाम रहे, जिनकी ग़ज़लें सिर्फ़ एहसास नहीं जगातीं—सोच को भी झकझोर देती हैं। उनकी पहचान सामाजिक सरोकारों, सियासी चेतना और तेज़ नज़रिए वाली शायरी से बनी, जिसकी गूंज मुशायरों के मंच पर भी खूब सुनाई देती रही। रज़्मी की पंक्तियाँ सरल लगती हैं, लेकिन उनके भीतर समय, समाज और इंसान की मनोवृत्ति पर तीखा सवाल छिपा होता है—यही वजह है कि उनकी शायरी श्रोताओं के दिल में उतरकर देर तक याद रह जाती है।
कोई सौग़ात-ए-वफ़ा दे के चला जाऊँगा
तुझ को जीने की अदा दे के चला जाऊँगा
मेरे दामन में अगर कुछ न रहेगा बाक़ी
अगली नस्लों को दुआ दे के चला जाऊँगा

ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल तो ठहर जाऊँगा
वर्ना ख़ुद्दार मुसाफ़िर हूँ गुज़र जाऊँगा
आँधियों का मुझे क्या ख़ौफ़ मैं पत्थर ठहरा
रेत का ढेर नहीं हूँ जो बिखर जाऊँगा

इस राज़ को क्या जानें साहिल के तमाशाई
हम डूब के समझे हैं दरिया तिरी गहराई
जाग ऐ मिरे हम-साया ख़्वाबों के तसलसुल से
दीवार से आँगन में अब धूप उतर आई

मुक़ाबले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
ये वलवले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
क़रीब आओ तो शायद समझ में आ जाए
कि फ़ासले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं

हर एक शख़्स तिरी चाह के गुमान में था
न जाने कौन सा जादू तिरी ज़बान में था
बुलंदियों के सलीक़े सिखा दिए जिस ने
कहाँ गया वो परिंदा जो आसमान में था Muzaffar Razmi
