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उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सामाजिक न्याय की आवाज बुलंद करती रही मायावती ने साफ कहा है कि महिलाओं को सिर्फ 33 प्रतिशत आरक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। उनका कहना है कि महिलाओं की आबादी को देखते हुए यह हिस्सा 50 प्रतिशत तक होना चाहिए।

UP News : उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री तथा बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने महिला आरक्षण को लेकर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा उठाया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सामाजिक न्याय की आवाज बुलंद करती रही मायावती ने साफ कहा है कि महिलाओं को सिर्फ 33 प्रतिशत आरक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। उनका कहना है कि महिलाओं की आबादी को देखते हुए यह हिस्सा 50 प्रतिशत तक होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने मांग की कि इस व्यवस्था में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण सुनिश्चित किया जाए। UP News
महिला आरक्षण के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश से उठी यह आवाज अब राष्ट्रीय बहस का विषय बनती दिख रही है। मायावती का कहना है कि यदि महिला आरक्षण को बिना सामाजिक संतुलन के लागू किया गया, तो इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक बराबरी से नहीं पहुंच पाएगा। उनके मुताबिक, उत्तर प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग की महिलाएं अब भी राजनीतिक भागीदारी के मामले में काफी पीछे हैं। ऐसे में सामान्य महिला आरक्षण के भीतर भी उनकी हिस्सेदारी तय करना जरूरी है। UP News
बसपा प्रमुख ने यह तर्क दिया कि सामाजिक रूप से कमजोर तबकों की महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का वास्तविक अवसर तभी मिलेगा, जब उनके लिए अलग प्रावधान होगा। उन्होंने संकेत दिया कि केवल सामान्य आरक्षण से प्रभावशाली और मजबूत वर्गों की महिलाओं को ज्यादा फायदा मिलने की आशंका बनी रहेगी। उत्तर प्रदेश की सामाजिक बनावट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यहां की राजनीति ने बार-बार साबित किया है कि बिना स्पष्ट हिस्सेदारी के कमजोर वर्ग पीछे छूट जाते हैं। मायावती ने महिला आरक्षण की मौजूदा सीमा को भी अपर्याप्त बताया। उनका कहना है कि जब महिलाएं आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं, तो उन्हें प्रतिनिधित्व भी उसी अनुपात में मिलना चाहिए। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यहां महिला वोटर अब एक निर्णायक ताकत बन चुकी हैं। ऐसे में 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक संदेश के तौर पर भी देखी जा रही है। UP News
मायावती ने अपने बयान के जरिए महिला आरक्षण को केवल लैंगिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के मुद्दे के रूप में पेश किया है। उत्तर प्रदेश में बसपा लंबे समय से दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों की राजनीति करती रही है। ऐसे में यह मांग उसी राजनीतिक लाइन का विस्तार मानी जा रही है, जिसमें प्रतिनिधित्व को केवल संख्या नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन के नजरिए से देखा जाता है। UP News
महिला आरक्षण के सवाल पर मायावती ने अपने राजनीतिक विरोधियों को भी नहीं छोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी माहौल आते ही कई दल सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन जब ठोस व्यवस्था बनाने की बारी आती है, तो पीछे हट जाते हैं। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में इस बयान को विपक्ष और सत्तापक्ष, दोनों के लिए संदेश के रूप में देखा जा रहा है। UP News
अपने पक्ष को मजबूती देने के लिए मायावती ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाने की लड़ाई नई नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सामाजिक न्याय के पुराने संघर्षों में मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में बाबा साहेब का नाम हमेशा केंद्रीय महत्व रखता है, इसलिए इस संदर्भ को भी खास राजनीतिक मायने के साथ देखा जा रहा है। UP News
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