क्या श्रीचंद शर्मा वास्तव में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए निर्धारित सभी आवश्यक योग्यताएं पूरी करते हैं ? मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा द्वारा उन्हें फिर प्रत्याशी बनाए जाने के बाद उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि चर्चा में क्यों आ गई है ?

UP News : उत्तर प्रदेश में इन दिनों विधान परिषद (MLC ) के चुनाव चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश में हो रहे MLC के चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से अपने वर्तमान MLC श्रीचंद शर्मा को एक बार फिर से प्रत्याशी बनाया है। भाजपा के द्वारा मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी बनाए गए श्रीचंद शर्मा की योग्यता तथा डिग्री को लेकर बहुत बड़ा खुलासा हुआ है। इस खुलासे में दावा किया गया है कि श्रीचंद शर्मा वास्तव में टीचर यानि अध्यापक तो हैं ही नहीं। श्रीचंद शर्मा फर्जी कागजों के आधार पर शिक्षक बनकर अपनी पार्टी BJP के नेताओं तथा उत्तर प्रदेश के लाखों शिक्षकों की आँखों में धूल झोंक रहे हैं। UP News
प्रसिद्ध शिक्षाविद्, पर्यावरणविद् तथा शिक्षक नेता कुलदीप मलिक ने मीडिया के सामने यह दावा किया है कि BJP प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा वास्तव में शिक्षक हैं ही नहीं। कुलदीप मलिक ने दावा किया है कि वह जल्द ही BJP के MLC प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा के फर्जी प्रमाण-पत्रों का खुलासा अदालत के सामने करके श्रीचंद शर्मा को शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लडऩे के लिए आयोग्य ठहराने की सिफारिश अदालत से जरूर करेंगे। UP News
आपको बता दें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लम्बे अर्से से जमीनी पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार के.पी. मलिक ने हाल ही में एक बड़ा आलेख लिखा है। के.पी. मलिक के आलेख का शीर्षक ‘‘शिक्षकों के मामले में सियासत नहीं, समाधान जरूरी’’ है। इस आलेख को हम यहां नीचे ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं। UP News
के.पी. मलिक का लेख दिल्ली में हुए हालिया आंदोलन से शुरू होता है। लेख में लिखा गया है कि नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए जेन के आंदोलन के बाद देश में शिक्षा का सवाल एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ गया है। युवाओं की बेचैनी, रोजक्षर का संकट और शिक्षा की गिरती गुणवत्ता ने एक ऐसे सवाल को जन्म दिया है, जिससे अव सरकारें और राजनीतिक दल मुंह नही मोड सकते, आखिर जिस शिक्षा व्यवस्था के कंधों पर विकसित भारत का सपना खड़ा किया जा रहा है. उसकी अपनी हालत क्या है? किसी भी देश के विकास की पहली शर्त मजबूत शिक्षा व्यवस्था है। दुनिया के जिन देशों ने आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक प्रगति की उचाईयों को छुआ है, उन्होंने शिक्षा को केवल चुनावी घोषणा नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। उत्तर प्रदेश इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। प्रदेश की विधान परिषद में शिक्षकों के लिए निर्धारित शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रो की मूल अवधारणा ही इसलिए बनाई गई थी कि शिक्षा जगत से जुड़े लोग अपने बीच से ऐसे प्रतिनिधि चुने जो सदन में शिक्षकों, विद्यार्थियों, विद्यालयों, महाविद्यालयों और पूरी शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठा सकें। अर्थात यह केवल एक चुनाव नहीं था। यह शिक्षा जगत को अपनी आवाज चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस व्यवस्था पर राजनीतिक दलो का प्रभाव जिस तेजी से बढ़ा है, उसने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की मूल धारणा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं सवाल यह नहीं है कि किसी राजनीतिक दल का समर्थित प्रत्याशी चुनाव क्यों लड़ रहा है। लोकतंत्र में हर नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार है। बल्कि असल सवाल यह है कि जिस सीट का निर्माण ही शिक्षकों की समस्याओं को विधान परिषद तक पहुंचाने के लिए हुआ था, क्या उस सीट पर उम्मीदवार की सबसे पहली पहचान राजनीतिक कार्यकर्ता होनी चाहिए या शिक्षक? मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र इसी तरह का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। पूर्व शिक्षक MLC प्रत्याशी डॉ. कुलदीप मलिक द्वारा मौजूद MLC श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक पृष्ठभूमि को लेकर गंभीर दावे किए गए हैं। उनका आरोप है कि श्री शर्मा शिक्षक नहीं रहे हैं और शिक्षा क्षेत्र में उनका पर्याप्त प्रत्यक्ष अनुभव नहीं रहा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित व्यक्ति का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने आना जरूरी है। क्योंकि लोकतांत्रिक बहस में आरोपों को तथ्य मान लेना उतना ही गलत है जितना गंभीर आरोपों को जांचे बिना खारिज कर देना। लेकिन इन आरोपों से अलग भी एक बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है। क्या शिक्षक एमएलसी के चुनाव में शिक्षक होना कोई क्षेत्र महत्व रखता है? अगर नहीं, तो फिर इस निर्वाचन को शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र कहने का औचित्य क्या है? और अगर हां, तो राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार तय करते समय उनकी शैक्षणिक योग्यता, शिक्षण अनुभव और शिक्षा जगत से उनका प्रत्यक्ष जुड़ाव कितनी प्राथमिकता रखता है। विडंबना देखिए कि शिक्षक अपने प्रतिनिधि को चुनने के लिए मतदान करता है. लेकिन यदि उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में शिक्षक की जगह राजनीतिक संगठन की ताकत निर्णायक हो जाए तो फिर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र भी राजनीति निर्वाचन क्षेत्र में बदलने लगता है। एक शिक्षक MLC को केवल शिक्षकों की वेतन संबंधी समस्याओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे शिक्षा की गुणवत्ता, सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों की स्थिति, शिक्षक भर्ती, सेवा नियम, विद्यालय प्रबंधन, विद्यार्थियों की सुविधाओं, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और शिक्षा के निजीकरण जैसे व्यापक मुद्दों की समझ होनी चाहिए। जिस व्यक्ति ने स्वयं कक्षा, विद्यालय, शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों को नजदीक से देखा हो उसके पास इन समस्याओं को समझने का अनुभव स्वाभाविक रूप अलग होगा। यही कारण है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की संवैधानिक भावना को केवल राजनीतिक समीकरणों से नहीं समझा जा सकता। इसलिए, मेरठ-सहारनपुर ही नहीं, उत्तर प्रदेश के सभी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के शिक्षकों और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों को इस बार एक गंभीर आत्ममंथन करना होगा। हमे यह तय करना होगा कि हमारा प्रतिनिधि कौन है हमारे बीच का शिक्षका या किसी राजनीतिक दल का उम्मीदवार? राजनीतिक दलों का समर्थन अपने आप में कोई अपराध नहीं है। लेकिन शिक्षक समुदाय को यह अधिकार जरूर है कि वह उम्मीदवार की पार्टी से पहले उसकी योग्यता देखे, उसके राजनीतिक संबंधों से पहले उसकी शिक्षा के प्रति प्रतिवद्धता देखे और उसके प्रचार तंत्र से पहले उसका पिछले वर्षों का काम देखे। लोकतंत्र में सबसे ताकतवर राजनीतिक दल भी मतदाता से बड़ा नहीं होता। UP News
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