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भारतीय जनता पार्टी अब उत्तर प्रदेश में सिर्फ संगठनात्मक मजबूती पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने पर भी खास फोकस कर रही है। इसी रणनीति के तहत अगले महीने राज्य की राजनीति में दो अहम फैसले देखने को मिल सकते हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी भले कुछ दूरी पर हों, लेकिन उत्तर प्रदेश की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी ने मिशन 2027 को लेकर अपनी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भारतीय जनता पार्टी अब उत्तर प्रदेश में सिर्फ संगठनात्मक मजबूती पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने पर भी खास फोकस कर रही है। इसी रणनीति के तहत अगले महीने राज्य की राजनीति में दो अहम फैसले देखने को मिल सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में अप्रैल के मध्य तक योगी सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार और आयोगों, निगमों तथा बोर्डों में लंबे समय से खाली पड़े पदों पर नियुक्तियां की जा सकती हैं। माना जा रहा है कि इन दोनों प्रक्रियाओं के जरिए बीजेपी अपने पारंपरिक और प्रभावशाली वोट बैंक को फिर से मजबूत करने की कोशिश में है।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में फिलहाल कई मंत्री पद खाली हैं। ऐसे में लंबे समय से चर्चा में चल रहा कैबिनेट विस्तार अब निर्णायक दौर में पहुंचता दिख रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह विस्तार बहुत बड़ा नहीं होगा, लेकिन पूरी तरह लक्ष्य आधारित रहेगा। इसमें उन क्षेत्रों और सामाजिक समूहों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जहां पार्टी अपने प्रतिनिधित्व को और मजबूत करना चाहती है। बताया जा रहा है कि कुछ नए चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है, जबकि कुछ वरिष्ठ नेताओं की भूमिका संगठन में बढ़ाई जा सकती है। इसके साथ ही कुछ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल भी संभव माना जा रहा है। हालांकि शीर्ष स्तर पर किसी बड़े बदलाव की संभावना फिलहाल कम बताई जा रही है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक संतुलन हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। बीजेपी भी इस बार इसी गणित को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रही है। पार्टी से जुड़े रणनीतिकार मानते हैं कि 2024 से पहले जो व्यापक समर्थन आधार बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा था, उसे 2027 से पहले फिर से संगठित करना जरूरी है। इसी वजह से उत्तर प्रदेश में होने वाले कैबिनेट विस्तार और विभिन्न संस्थाओं में नियुक्तियों के दौरान अगड़ी जातियों, गैर-यादव पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा समाज और गैर-जाटव वर्ग को साधने की कोशिश की जाएगी। बीजेपी की नजर खास तौर पर उन तबकों पर है, जिन्होंने पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में उसे बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।
बीजेपी ने पिछले कुछ समय में उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति को ध्यान में रखकर कई संकेत दिए हैं। पहले प्रदेश संगठन में पिछड़े वर्ग से आने वाले चेहरे को आगे कर पार्टी ने स्पष्ट संदेश दिया। अब अति पिछड़े समाज से जुड़े प्रतिनिधित्व को महत्व देकर भी यह जताने की कोशिश की जा रही है कि पार्टी सामाजिक भागीदारी के सवाल पर सक्रिय है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी अब केवल चुनावी नारों के भरोसे नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की ठोस राजनीति के जरिए अपने आधार को और मजबूत करना चाहती है। ऐसे में कैबिनेट और नियुक्तियों दोनों में सामाजिक संतुलन सबसे अहम कसौटी बन सकता है।
उत्तर प्रदेश में इस पूरी कवायद को लेकर संगठन और सरकार के स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। लखनऊ में शीर्ष नेताओं के बीच लगातार मंथन चल रहा है। माना जा रहा है कि राज्य स्तर पर नामों और समीकरणों पर प्रारंभिक चर्चा के बाद अंतिम सूची पर फैसला दिल्ली में होगा। यानी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हलचल का केंद्र भले लखनऊ बना हुआ हो, लेकिन आखिरी मुहर केंद्रीय नेतृत्व ही लगाएगा। यही वजह है कि संभावित नामों को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर अभी सामने आनी बाकी है।
उत्तर प्रदेश के कई आयोगों, बोर्डों और निगमों में लंबे समय से बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं। इनमें कई ऐसे पद भी शामिल हैं, जिन पर राजनीतिक नियुक्तियां होनी हैं। इसके अलावा मनोनीत पदों को लेकर भी काफी समय से इंतजार बना हुआ है। सूत्र बताते हैं कि इन रिक्तियों को भरने में देरी की एक बड़ी वजह अंदरूनी खींचतान और सहमति का अभाव रहा। अब पार्टी नेतृत्व चाहता है कि उत्तर प्रदेश में इन पदों पर जल्द नियुक्तियां की जाएं, ताकि संगठनात्मक असंतोष कम हो और विभिन्न सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व भी मिल सके।
बीजेपी के भीतर यह समझ साफ है कि उत्तर प्रदेश में चुनावी जीत सिर्फ संगठनात्मक ताकत से नहीं, बल्कि मजबूत सामाजिक गठजोड़ से तय होगी। यही कारण है कि पार्टी कैबिनेट विस्तार और संस्थागत नियुक्तियों को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी तैयारी के अहम हिस्से के तौर पर देख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उत्तर प्रदेश में जिन चेहरों को आने वाले समय में जिम्मेदारी मिलेगी, उनमें जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक उपयोगिता का संतुलन साफ दिख सकता है। पार्टी का उद्देश्य यही रहेगा कि कोई भी प्रभावशाली वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस न करे और चुनाव से पहले संदेश जाए कि सबको हिस्सेदारी दी जा रही है। UP News
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