ब्रज में सावन की पुरानी परंपरा धीरे-धीरे सिमट रही है। पेड़ों पर झूले और महिलाओं के सामूहिक लोकगीत अब पहले की तरह नजर नहीं आते।

मथुरा। सावन का महीना ब्रज की लोक संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ा रहा है। कभी गांवों में सावन शुरू होते ही पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ जाते थे और महिलाओं की टोलियां लोकगीत गाते हुए नजर आती थीं। लेकिन बदलती जीवनशैली के बीच ब्रज की यह पुरानी परंपरा अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। इस बार भी गांवों और कस्बों में सावन के झूलों और सामूहिक लोकगीतों की वह रौनक कम दिखाई दे रही है, जो कभी इस मौसम की पहचान हुआ करती थी।
सावन के दिनों में सुबह और शाम महिलाओं का समूह पेड़ों के नीचे जुटता था। पेड़ों की मजबूत डालियों पर झूले लगाए जाते और महिलाएं बारी-बारी से झूला झूलते हुए सावन के गीत गाती थीं। यह परंपरा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थी, बल्कि महिलाओं के आपसी मेल-जोल और ब्रज की लोक संस्कृति को भी मजबूत करती थी।
स्थानीय महिला भारती देवी बताती हैं कि पहले सावन शुरू होते ही गांवों और आसपास के क्षेत्रों में बड़े पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे। महिलाएं और युवतियां समूह बनाकर झूला झूलतीं और घंटों सावन के गीत गाती थीं। अब यह दृश्य पहले की तुलना में काफी कम दिखाई देता है। मीना देवी के मुताबिक, पहले सावन में झूला झूलने को लेकर महिलाओं और युवतियों में खास उत्साह रहता था। परिवार की महिलाएं साथ निकलती थीं और सामूहिक रूप से सावन के गीत गाते हुए समय बिताती थीं। नई पीढ़ी में इस परंपरा के प्रति पहले जैसा आकर्षण नहीं रह गया है।UP News
सुमन का कहना है कि सावन के झूले ब्रज की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। पहले घरों और गांवों के आसपास बड़े पेड़ आसानी से मिल जाते थे, जिनकी डालियों पर झूले डाले जाते थे। महिलाएं एक साथ जुटकर उत्सव जैसा माहौल बना देती थीं। अब पेड़ों की संख्या कम होने के साथ लोगों की दिनचर्या भी बदल गई है। राधा के अनुसार, सावन के लोकगीत और झूलों की याद आज भी बुजुर्ग महिलाओं के मन में ताजा है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी को इस सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ने की जरूरत है, ताकि ब्रज की लोक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके। UP News
मोबाइल फोन, टेलीविजन और मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने लोगों की जीवनशैली को काफी बदल दिया है। पहले सावन के दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से समय बिताती थीं, लेकिन अब परिवार, नौकरी और घरेलू जिम्मेदारियों की व्यस्तता के कारण ऐसे आयोजन कम होते जा रहे हैं। ब्रज में सावन आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से खास महत्व रखता है, लेकिन झूले और लोकगीतों की घटती मौजूदगी इस बात का संकेत है कि लोक परंपराओं को सहेजने के लिए नई पीढ़ी को उनसे जोड़ना जरूरी है। यदि समय रहते इन परंपराओं को सामूहिक आयोजनों और स्थानीय स्तर पर बढ़ावा नहीं मिला तो सावन की यह पुरानी सांस्कृतिक पहचान आने वाले वर्षों में और कमजोर हो सकती है। UP News
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