भारत में राजनीतिक दलों की फंडिंग, चुनावी पारदर्शिता और चंदे के रुझानों पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताजा रिपोर्ट ने देश की सियासत के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है।

UP News : भारत में राजनीतिक दलों की फंडिंग, चुनावी पारदर्शिता और चंदे के रुझानों पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताजा रिपोर्ट ने देश की सियासत के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय दलों को 20 हजार रुपये से अधिक के दान में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस बढ़त का सबसे बड़ा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला, जबकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी निर्णायक भूमिका निभाने वाली बहुजन समाज पार्टी इस श्रेणी में एक बार फिर खाली हाथ रही। ADR के आंकड़ों की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मायावती की अगुवाई वाली बसपा को लगातार 19वें साल भी 20 हजार रुपये से ऊपर का एक भी दान नहीं मिला। यानी राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक फंडिंग का दायरा भले तेजी से बढ़ा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश से निकली इस बड़ी पार्टी की आर्थिक रफ्तार अब भी थमी हुई दिखाई देती है।
एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय दलों को 20 हजार रुपये से अधिक के दान के रूप में कुल 6648.56 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। यह राशि 11,343 दानदाताओं से मिली। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में यह बढ़ोतरी करीब 161 प्रतिशत रही। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि देश की राजनीति में बड़े फंड की भूमिका लगातार और मजबूत हो रही है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक बढ़त भाजपा के खाते में दर्ज हुई। पार्टी को 5522 दानदाताओं से 6074.01 करोड़ रुपये का चंदा मिला। वहीं कांग्रेस को 2501 दानदाताओं से 517.39 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। रिपोर्ट के अनुसार भाजपा को मिला कुल चंदा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, माकपा और नेशनल पीपुल्स पार्टी को मिले संयुक्त चंदे से भी दस गुना से अधिक रहा।
बसपा केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सामाजिक और चुनावी राजनीति का एक बड़ा स्तंभ रही है। ऐसे में यह तथ्य बेहद अहम हो जाता है कि जिस पार्टी ने कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता की दिशा तय की, उसे अब 20 हजार रुपये से अधिक का एक भी चंदा नहीं मिल रहा। यह स्थिति सिर्फ आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह बसपा की मौजूदा राजनीतिक सक्रियता, जनाधार और संसाधन जुटाने की क्षमता पर भी सवाल खड़े करती है। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े और सबसे अहम राजनीतिक राज्य में, जहां चुनावी तैयारी, संगठन और संसाधन किसी भी दल की ताकत तय करते हैं, वहां बसपा की यह स्थिति उसके लिए चिंता का संकेत मानी जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय दलों को मिले कुल चंदे में 2023-24 की तुलना में 2024-25 में 4104.28 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। इसमें सबसे बड़ा योगदान भाजपा का रहा। पार्टी को पिछले वित्त वर्ष में 2243.94 करोड़ रुपये का चंदा मिला था, जो इस बार बढ़कर 6074.01 करोड़ रुपये हो गया। यानी भाजपा के चंदे में 171 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं, कांग्रेस की फंडिंग में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ। कांग्रेस को 2023-24 में 281.48 करोड़ रुपये मिले थे, जो बढ़कर 517.39 करोड़ रुपये तक पहुंच गए। इस तरह पार्टी के चंदे में करीब 84 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
एडीआर रिपोर्ट में अन्य राष्ट्रीय दलों के आंकड़े भी दिलचस्प हैं। आम आदमी पार्टी को 27.04 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जो पिछले वर्ष की तुलना में 244 प्रतिशत अधिक है। वहीं नेशनल पीपुल्स पार्टी को 1.94 करोड़ रुपये मिले, जिसमें 1313 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन इस पूरी तस्वीर में सबसे अलग स्थिति बहुजन समाज पार्टी की रही। उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति की केंद्रीय ताकत मानी जाने वाली यह पार्टी बड़े दान के मामले में लगातार पिछड़ती नजर आई। वित्त वर्ष 2024-25 में भी पार्टी को 20 हजार रुपये से अधिक का कोई दान प्राप्त नहीं हुआ। UP News