महर्षि वाल्मीकि जयंती पर चेतना मंच की विशेष प्रस्तुति में जानिए चित्रकूट मंडल के बांदा में साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ द्वारा ‘अद्भुत रामायण’ की दुर्लभ पांडुलिपि मिलने के दावे की कहानी।

रामचरित मानस के रचनाकार तुलसीदास के चित्रकूट मंडल में डॉ. ललित ने की महर्षि वाल्मीकि रचित 'अद्भुत रामायण' की खोज
UP News : उत्तर प्रदेश के चित्रकूट मंडल बांदा के प्रमुख साहित्यकार, कवि, शिक्षाविद और शोधकर्ता डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित 'ललित' ने महर्षि वाल्मीकि रचित 'अद्भुत रामायण' की खोज का दावा किया है। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में इस कृति की प्रतिलिपि एक पन्ना भी उपलब्ध कराया है। 14 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के हसवा ग्राम में जन्मे डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित 'ललित' चित्रकूट के राष्ट्रीय रामायण मेला के संस्थापक संचालकों में हैं। उन्होंने सैकड़ों दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज की है। डॉ. दीक्षित ने 1983 में संत लालदास रचित 'अवधविलास महाकाव्य' का संपादन और प्रकाशन कर ख्याति अर्जित की। रामकथा और भारतीय संस्कृति पर योगदान के लिए उन्हें विश्व हिंदी सम्मेलन सहस्राब्दी सम्मान प्रदान कर चुका है। वह तुलसी पुरस्कार से भी अलंकृत हो चुके हैं। UP News
यह भी पढ़ें बेटे की पिटाई से नाराज भाभी ने दांत से काट डाला देवर का प्राइवेट पार्ट, अस्पताल में लगे 55 टांके
वाल्मीकि जयंती के अवसर पर बांदा स्थित अपने घर पर चेतना मंच के साथ विशेष बातचीत में डॉ. ललित ने 'अद्भुत रामायण' पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा, '' कौंच वध की पीड़ा से निकली महाकवि की करुणा ने ही कविता का रूप ले लिया। दुलर्भ पांडुलिपियों के खोज के दौरान कुछ समय पहले महर्षि वाल्मीकि रचित 'अद्भुत रामायण ' की संवत 1876 की प्रतिलिपि मिल गई है।'' उन्होंने बताया कि यह प्रतिलिपि प्राचीन हस्तनिर्मित कागज में काली स्याही में लिखी है। कागज का आकार 12×6 के आकार में है। इसमें 26 सर्ग और कुल 1400 श्लोक हैं। उन्होंने बताया कि इसके एक सर्ग में सीताजी के सहत्र नामों की चर्चा है। ऐसे प्रसंग किसी दूसरी रामकथा और राम काव्य में देखने को नहीं मिलते। इस कथा में सीता उत्पत्ति के अलावा तत्कालीन राजनीतिक घटनाचक्र, सैन्य पृष्ठभूमि और युद्ध रणनीति पर भी प्रसंग हैं। संस्कृत साहित्य के विद्वान गया प्रसाद त्रिपाठी ने डॉ. ललित के इस शोध कार्य को चित्रकूट मंडल में साहित्य और संस्कृति अवदान के लिए बधाई दी है। डॉ. ललित कहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ने अपनी कुटी में ही भगवती सीता को संरक्षण और लव-कुश को रामायण गान सिखाया था। यह संयोग ही है चित्रकूट जिले के लालापुर क्षेत्र के समीप स्थित भौंरी गांव और लालापुर आश्रम को महर्षि वाल्मीकि की जन्मस्थली और तपोभूमि के रूप में माना जाता है। लालापुर चित्रकूट शहर से लगभग 18 किलोमीटर दूर है। यहां एक पहाड़ी की चोटी पर महर्षि वाल्मीकि का प्रसिद्ध आश्रम है। पौराणिक मान्यता है कि इसी स्थान पर महर्षि वाल्मीकि ने आदि काव्य 'रामायण' की रचना की थी। हालांकि महर्षि वाल्मीकि की जन्मस्थली के बारे में ऐतिहासिक और पौराणिक रूप से कोई एक सर्वमान्य स्थान स्पष्ट नहीं है। कुछ विद्वान उनका जन्म उत्तर प्रदेश में तमसा नदी के पास मानते हैं। कई शोधकर्ता उनका जन्म जलगांव (महाराष्ट्र) को मानते हैं। इनका दावा कि वाल्मीकि की जन्मस्थली जलगांव जिले की चाळीसगाव तहसील के 'वालझरी' गांव को माना जाता है। इसके अलावा नेपाल के चितवन जिले में स्थित वाल्मीकि आश्रम को उनका मूल आश्रम और तपस्थली माना जाता है। UP News
:इसे भी पढ़ें : बड़ी खबर: सोमवार को रहेगा अवकाश, स्कूल-कॉलेज और सरकारी कार्यालय रहेंगे बंद
हिंदी साहित्य के मानिंद हस्ताक्षर डॉ.चंद्रिका प्रसाद दीक्षित को वात्सल्य शिरोमणि कहे जाने वाले सूरदास की सूरमंजरी खोजने का श्रेय है। यूनेस्को ने साल 2000 में उन्हें विश्व हिंदी सेवा सहस्त्राब्दी पुरस्कार से नवाजा था। इसमें महाकवि सूरदास के 797 पदों का हस्तलिखित संग्रह है। उनकी इस खोज का समाचार बीबीसी लंदन ने प्रसारित किया था। कबीर ग्रंथावली की परंपरा में डॉ.ब्रजमोहन पांडेय विनीत खागा, राम मनोहर शुक्ल बेंहटा मलवा, डॉ.रतिभान सिंह किशनपुर ने डॉ.ललित की खोजी पांडुलिपियों पर पीएचडी की डिग्री प्राप्त की है। डॉ.ललित कहते हैं कि युवावस्था के दौरान उनकी मुलाकात पंडित राहुल सांकृत्यायन से प्रयागराज में हुई थी। वहीं चित्रकूट के कई स्थानों में साहित्य की पांडुलिपियों के मौजूद होने का जिक्र हुआ। राहुल ने इस मुलाकात के बाद तिब्बत का रुख किया और उन्होंने चित्रकूट का। हजारों यात्रा करने के बाद ये पांडुलिपियां प्राप्त हो सकीं। UP News
विज्ञापन