पार्टी 15 मार्च को कांशीराम जयंती के मौके पर पूरे उत्तर प्रदेश में एक सप्ताह तक सामाजिक कार्यक्रमों की श्रृंखला चलाएगी, जिसकी शुरुआत 13 मार्च से लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान स्थित जुपिटर हॉल से होगी। इस आयोजन में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मुख्य वक्ता के रूप में शामिल होंगे।

UP News : उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने है। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनितिक दलों ने अपनी अपनी तैयारी शुरू कर दी हैं।सूबे की राजनीति में खासकर दलित वोटबैंक को लेकर नई सक्रियता साफ दिखाई दे रही है। इसी कड़ी में कांग्रेस ने बहुजन आंदोलन के प्रखर नायक मान्यवर कांशीराम की विरासत को केंद्र में रखकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की तैयारी की है। पार्टी 15 मार्च को कांशीराम जयंती के मौके पर पूरे उत्तर प्रदेश में एक सप्ताह तक सामाजिक कार्यक्रमों की श्रृंखला चलाएगी, जिसकी शुरुआत 13 मार्च से लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान स्थित जुपिटर हॉल से होगी। इस आयोजन में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मुख्य वक्ता के रूप में शामिल होंगे। कांग्रेस इस कार्यक्रम को सिर्फ श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि सामाजिक न्याय, बराबरी, भागीदारी और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि पार्टी ने कांशीराम जयंती को ‘सामाजिक परिवर्तन दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया है और इसमें दलित, पिछड़ा तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़े बुद्धिजीवियों, चिंतकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जोड़ने की रणनीति बनाई है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी के बीच कांग्रेस का यह कदम महज एक सांकेतिक आयोजन नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बसपा के पारंपरिक वोटबैंक तक पहुंच बनाने की संगठित कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की राजनीतिक सक्रियता पहले जैसी नहीं रही है। पार्टी के भीतर सीमित गतिविधियां और जमीनी स्तर पर कमजोर होती पकड़ ने विपक्षी दलों को यह सोचने का मौका दिया है कि दलित समाज के एक हिस्से को नए राजनीतिक विकल्प की तरफ आकर्षित किया जा सकता है। इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने कांशीराम की विरासत को सम्मान देने के साथ-साथ उसे राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाने की रणनीति तैयार की है।
राहुल गांधी पिछले कुछ समय से सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना और आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं। कांग्रेस का मानना है कि यह राजनीतिक लाइन उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़े वर्गों के बीच नई जमीन बना सकती है। पार्टी को उम्मीद है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस और संविधान की सुरक्षा जैसे मुद्दे बहुजन समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित कर सकते हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान भी राहुल गांधी ने संविधान, सामाजिक न्याय और जातीय जनगणना को बड़े मुद्दे के तौर पर पेश किया था। कांग्रेस का आकलन है कि उत्तर प्रदेश में यही मुद्दे आगे चलकर विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीति में भी असर डाल सकते हैं। ऐसे में कांशीराम जयंती के बहाने सामाजिक कार्यक्रमों की यह श्रृंखला राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
उत्तर प्रदेश में बहुजन राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा लंबे समय तक बसपा और मायावती रही हैं। लेकिन कांग्रेस अब यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि कांशीराम की विचारधारा केवल एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की व्यापक धारा का हिस्सा है। कांग्रेस की रणनीति इस बात पर टिकी है कि यदि वह बहुजन समाज के बीच वैचारिक भरोसा बना पाती है, तो उत्तर प्रदेश की चुनावी तस्वीर में नया बदलाव संभव हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस पहल के जरिए दो मोर्चों पर काम कर रही है। एक ओर वह दलित समाज को सीधे संबोधित करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में खुद को सामाजिक न्याय की राजनीति के सक्रिय दावेदार के रूप में स्थापित करना चाहती है।
उत्तर प्रदेश में कांशीराम की विरासत को लेकर सिर्फ कांग्रेस ही सक्रिय नहीं है। समाजवादी पार्टी भी इस अवसर को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मान रही है। सपा ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वह 15 मार्च को बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करेगी और इस दिन को PDA दिवस के रूप में मनाएगी। PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—यह वही सामाजिक समीकरण है, जिसे सपा उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने नए फॉर्मूले के रूप में आगे बढ़ा रही है। हालांकि, इस मुद्दे पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सपा की इस पहल को राजनीतिक नाटक करार देते हुए कहा कि बहुजन महापुरुषों और उनके योगदान के प्रति समाजवादी पार्टी का रवैया सम्मानजनक नहीं रहा है। मायावती का यह बयान साफ संकेत देता है कि कांशीराम की विरासत को लेकर उत्तर प्रदेश में सियासी संघर्ष और तेज होने वाला है।
कांग्रेस, बसपा और सपा—तीनों दल अब उत्तर प्रदेश में दलित और बहुजन राजनीति की जमीन पर अपने-अपने तरीके से सक्रिय नजर आ रहे हैं। कांग्रेस जहां कांशीराम जयंती के जरिए वैचारिक और सामाजिक पहुंच बनाना चाहती है, वहीं सपा PDA के जरिए नए सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने में लगी है। दूसरी ओर बसपा अपनी मूल राजनीतिक विरासत और पारंपरिक आधार को बचाए रखने की चुनौती का सामना कर रही है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में आने वाले दिनों में कांशीराम का नाम सिर्फ श्रद्धांजलि कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह चुनावी रणनीति, सामाजिक प्रतिनिधित्व और बहुजन वोटबैंक की नई दिशा तय करने वाले केंद्रीय मुद्दों में शामिल हो सकता है।
विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर जरूर है, लेकिन उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी सामाजिक जमीन मजबूत करने की तैयारी अभी से शुरू कर दी है। कांग्रेस की यह नई पहल बताती है कि पार्टी उत्तर प्रदेश में खुद को फिर से प्रासंगिक बनाने के लिए सिर्फ पारंपरिक राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की वैचारिक लड़ाई पर भी फोकस कर रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि उत्तर प्रदेश में कांशीराम की विरासत पर शुरू हुई यह नई राजनीतिक होड़ किस दल को वास्तविक फायदा पहुंचाती है। लेकिन इतना तय है कि दलित राजनीति के केंद्र रहे उत्तर प्रदेश में आने वाले समय में यह मुद्दा और ज्यादा गरमाने वाला है। UP News