प्रदेश के जिले में छह साल की मासूम के साथ हुई दरिंदगी के मामले में अदालत ने बेहद सख्त और त्वरित फैसला सुनाते हुए न्याय व्यवस्था की तत्परता का उदाहरण पेश किया है।

UP News : उत्तर प्रदेश के जिले में छह साल की मासूम के साथ हुई दरिंदगी के मामले में अदालत ने बेहद सख्त और त्वरित फैसला सुनाते हुए न्याय व्यवस्था की तत्परता का उदाहरण पेश किया है। विशेष पाक्सो अदालत ने मुख्य आरोपी को आजीवन कारावास (मरने तक) की सजा सुनाई है, जबकि साक्ष्य छिपाने में सहयोग करने वाली उसकी मां को भी जेल भेजने का आदेश दिया गया है।
यह मामला 20-21 फरवरी 2026 की रात का है, जब एक शादी समारोह के दौरान मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आई थी। पुलिस ने तेजी दिखाते हुए महज 5 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी। इसके बाद अदालत में सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हुई और कुल 16 कार्यदिवस के भीतर फैसला सुना दिया गया, जो इस तरह के गंभीर मामलों में त्वरित न्याय का उदाहरण माना जा रहा है।
अदालत ने आरोपी को पाक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जो उसके शेष जीवन तक प्रभावी रहेगी। इसके साथ ही उस पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है। वहीं, आरोपी की मां को साक्ष्य छिपाने और अपराध में सहयोग करने का दोषी मानते हुए 4 साल की कठोर कारावास और जुर्माने की सजा दी गई है।
घटना के वक्त बच्ची अपने परिजनों के साथ एक शादी समारोह में शामिल होने आई थी। देर रात वह अचानक लापता हो गई, जिसके बाद परिजन उसकी तलाश में जुट गए। तलाश के दौरान परिजनों ने उसे एक सुनसान जगह पर गंभीर हालत में पाया। आरोपी मौके से फरार हो गया था। बच्ची को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उसका इलाज कराया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया और साक्ष्य जुटाकर मजबूत केस तैयार किया। इस पूरे प्रकरण में आॅपरेशन कनविक्शन के तहत पुलिस और अभियोजन पक्ष ने तेजी से पैरवी की, जिसके चलते कम समय में सजा सुनिश्चित हो सकी। अदालत में 13 गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध हुआ।
पीड़िता के भविष्य के लिए कोर्ट का निर्देशअदालत ने एक अहम आदेश देते हुए कहा कि दोषियों से वसूली गई जुर्माने की राशि पीड़िता के पुनर्वास, शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए उपयोग की जाएगी। गोरखपुर का यह मामला न सिर्फ एक जघन्य अपराध पर सख्त सजा का उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि अगर जांच और पैरवी मजबूत हो, तो त्वरित न्याय संभव है। इस फैसले से समाज में एक स्पष्ट संदेश गया है कि मासूमों के खिलाफ अपराध करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।