उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में करीब 11 साल पुराने एक मामले ने पुलिस व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। थाने से शुरू हुई शिकायत, हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, सीबीसीआईडी की क्लीन चिट और फिर अदालत का फैसला। आखिर पीड़िता की लंबी कानूनी लड़ाई में ऐसा क्या हुआ कि दो पुलिसकर्मियों को दोषी

UP News : उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद से सामने आया यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि न्याय पाने के लिए करीब 11 साल तक चली एक महिला की कानूनी लड़ाई की कहानी है। जिस पुलिस से पीड़िता को मदद की उम्मीद थी, उसी पुलिस के कुछ कर्मियों ने उस पीड़िता का ही सामूहिक दुष्कर्म जैसा घिनौना कृत्य कर डाला था। मामला थाने से शुरू होकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, हाईकोर्ट, CBCID की जांच और फिर अदालत तक पहुंचा। इस दौरान जांच एजेंसी ने आरोपियों को क्लीन चिट देते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी, लेकिन पीड़िता ने हार नहीं मानी और अदालत में उसे चुनौती दी। अब इस मामले में करीब 11 साल बाद बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। सहारनपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 5 नवंबर 2026 को तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजमोहन यादव और तत्कालीन SSI वेदपाल सिंह को दोषी करार दिया। अदालत के फैसले के बाद दोनों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया। 6 नवंबर को उनकी सजा के प्रश्न पर सुनवाई निर्धारित की गई है। पीड़िता पक्ष ने अधिकतम सजा, आजीवन कारावास और भारी जुर्माने की मांग की है।
इस पूरे मामले की शुरुआत 29 जुलाई 2015 को हुई थी। पीड़िता के अधिवक्ता राजीव तोमर के मुताबिक, देवबंद पुलिस ने महिला के पति को उसके घर से हिरासत में लिया था। बाद में एक मामले में उसकी गिरफ्तारी दिखाकर उसे जेल भेज दिया गया। पति की गिरफ्तारी के बाद महिला लगातार उसे छुड़ाने और उसके बारे में जानकारी लेने का प्रयास कर रही थी। 6 अगस्त 2015 को वह अपनी दो महिला रिश्तेदारों के साथ देवबंद थाने पहुंची थी। पीड़िता का आरोप था कि थाने में मौजूद एक उपनिरीक्षक पंकज धामा ने उसे तत्कालीन थाना प्रभारी से मिलवाने के बहाने पुलिस आवास पर पहुंचाया। वहां तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजमोहन यादव, SSI वेदपाल सिंह, पंकज धामा और एक अन्य पुलिसकर्मी मौजूद थे। महिला ने आरोप लगाया कि वहां चारों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। जब उसकी महिला रिश्तेदारों ने विरोध करने की कोशिश की तो उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें धमकाया गया।
पीड़िता ने घटना के बाद पुलिस से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की। उसका आरोप था कि स्थानीय पुलिस ने उसकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज नहीं किया। इसके बाद उसने तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के सामने भी अपनी बात रखी, लेकिन वहां से भी उसे राहत नहीं मिली। पीड़िता के सामने अब न्याय पाने का रास्ता बेहद मुश्किल हो गया था। जिन पुलिसकर्मियों पर उसने आरोप लगाया था, उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए उसे पुलिस व्यवस्था से बाहर जाकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। आखिरकार उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की और मामले में मुकदमा दर्ज कराने की मांग की।
पीड़िता की कानूनी लड़ाई के बाद इस मामले में 7 नवंबर 2017 को बड़ा घटनाक्रम हुआ। हाईकोर्ट के निर्देश पर देवबंद थाने में चार लोगों के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म और धमकी देने समेत संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। इसके बाद मामले की जांच अपराध शाखा अपराध अनुसंधान विभाग यानी CBCID को सौंप दी गई। हालांकि, जांच पूरी होने के बाद CBCID ने आरोपों को सही नहीं मानते हुए अदालत में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी। इस रिपोर्ट से पीड़िता को एक बार फिर झटका लगा, लेकिन उसने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसने अदालत में प्रोटेस्ट पिटीशन यानी विरोध याचिका दाखिल कर CBCID की अंतिम रिपोर्ट को चुनौती दी। इसके बाद मामला न्यायिक सुनवाई की दिशा में आगे बढ़ा।
इस मामले का एक अहम पहलू यह है कि जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट के बाद भी पीड़िता ने न्याय पाने की उम्मीद नहीं छोड़ी। पीड़िता की ओर से दाखिल विरोध याचिका पर अदालत ने सुनवाई की। मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और शिकायत के आधार पर आरोपियों को तलब किया गया। इसके बाद मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। अदालत में पीड़िता, उसके साथ मौजूद महिला रिश्तेदारों, अन्य गवाहों और चिकित्सक के बयान दर्ज किए गए। बचाव पक्ष की ओर से भी गवाह पेश किए गए। करीब नौ साल तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने दो पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया। इस तरह CBCID की अंतिम रिपोर्ट के बावजूद पीड़िता की ओर से जारी कानूनी लड़ाई मुकदमे को फैसले तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण साबित हुई।
करीब 11 साल तीन महीने की कानूनी लड़ाई के बाद 5 नवंबर 2026 को सहारनपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वितीय ने इस मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजमोहन यादव और तत्कालीन SSI वेदपाल सिंह को सामूहिक दुष्कर्म के मामले में दोषी करार दिया। फैसले के बाद दोनों को अदालत परिसर से ही हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया। इस फैसले को पीड़िता की लंबी कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि अदालत ने दोनों को दोषी करार दिया है, लेकिन सजा की अवधि और जुर्माने का अंतिम निर्धारण अलग सुनवाई में होना है।
इस मामले में दोषी ठहराए गए दोनों पुलिसकर्मियों में ब्रजमोहन यादव घटना के समय देवबंद थाने के प्रभारी थे। बाद में उनका प्रमोशन क्षेत्राधिकारी (CO) के पद पर हुआ और वह सेवानिवृत्त हो चुके हैं। दूसरे दोषी वेदपाल सिंह घटना के समय देवबंद थाने में वरिष्ठ उपनिरीक्षक (SSI) के पद पर तैनात थे। उनकी बाद में फिरोजाबाद जिले में तैनाती हुई थी। दोनों को अदालत ने 5 नवंबर को दोषी करार दिया और फैसले के बाद हिरासत में लेकर जेल भेज दिया।
इस मामले में शुरुआत में चार लोगों के नाम सामने आए थे। इनमें ब्रजमोहन यादव, वेदपाल सिंह, चौकी प्रभारी पंकज धामा और एक अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे। हालांकि, मुकदमे की सुनवाई अंततः ब्रजमोहन यादव और वेदपाल सिंह के खिलाफ ही चली। चौकी प्रभारी पंकज धामा ने मानसिक रूप से अस्वस्थ होने संबंधी मेडिकल दस्तावेज और हलफनामा पेश किया था। इसके बाद उनकी पत्रावली अलग कर दी गई। वहीं चौथे आरोपी की पहचान नहीं हो सकी। इसलिए अदालत के हालिया फैसले को सभी चार आरोपियों के खिलाफ फैसला नहीं समझना चाहिए। अभी तक दोषी ठहराए जाने की पुष्टि केवल ब्रजमोहन यादव और वेदपाल सिंह के संबंध में हुई है।
पीड़िता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता राजीव तोमर ने बताया कि दोषियों की सजा के प्रश्न पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जानी हैं। पीड़िता पक्ष की मांग है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों दोषियों को अधिकतम सजा दी जाए। इसमें आजीवन कारावास और भारी जुर्माने की मांग शामिल है। अधिवक्ता के अनुसार, भारतीय दंड संहिता की धारा 376D के तहत सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में कम से कम 20 वर्ष के कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान था। इसके साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। पीड़िता पक्ष ने मुआवजे की मांग भी उठाई है। हालांकि, अंतिम सजा और मुआवजे पर अदालत का आदेश ही निर्णायक होगा।
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