प्रदेश में सरकारी राशन दुकानदारों (कोटेदारों) ने कमीशन बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है। कोटेदारों का कहना है कि मौजूदा कमीशन में बढ़ती महंगाई और संचालन खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है।

UP News : उत्तर प्रदेश में सरकारी राशन दुकानदारों (कोटेदारों) ने कमीशन बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है। कोटेदारों का कहना है कि मौजूदा कमीशन में बढ़ती महंगाई और संचालन खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने सरकार से प्रति क्विंटल कमीशन बढ़ाने और अन्य सुविधाएं देने की मांग की है।
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उत्तर प्रदेश के हजारों कोटेदारों ने कमीशन बढ़ाने, लंबित भुगतान जारी करने और नियमित मानदेय जैसी मांगों को लेकर लखनऊ में प्रदर्शन किया। कोटेदार संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं हुआ तो अगस्त महीने में राशन वितरण प्रभावित हो सकता है। कोटेदारों की सबसे बड़ी मांग कमीशन बढ़ाने की है। उनका कहना है कि वर्तमान में उन्हें खाद्यान्न वितरण पर करीब 90 रुपये प्रति क्विंटल लाभांश मिलता है, जबकि वे इसे बढ़ाकर 200 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग कर रहे हैं।
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राशन दुकानदारों को सरकार की ओर से कोई निश्चित वेतन नहीं मिलता है। उनकी आय मुख्य रूप से राशन वितरण पर मिलने वाले कमीशन पर निर्भर करती है।
कोटेदारों को मिलने वाली आय इन बातों पर निर्भर करती है—
कई कोटेदारों का कहना है कि बिजली बिल, दुकान का किराया, कर्मचारी खर्च, परिवहन और डिजिटल मशीनों से जुड़े खर्च निकालने के बाद उनकी वास्तविक बचत काफी कम रह जाती है।
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देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत राशन वितरण की व्यवस्था केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से चलती है। केंद्र सरकार खाद्यान्न उपलब्ध कराती है, जबकि राशन दुकानदारों के मार्जिन और अतिरिक्त सुविधाओं का फैसला राज्य सरकारें अपनी नीतियों के अनुसार करती हैं। इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में कोटेदारों को मिलने वाला कमीशन अलग-अलग है।
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अलग-अलग राज्यों में राशन दुकानदारों को मिलने वाला लाभांश अलग है।
कोटेदार संगठनों का कहना है कि कई राज्यों में बेहतर कमीशन और अतिरिक्त सुविधाएं मिलने के कारण वहां राशन दुकानदारों की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है।
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राशन डीलर लंबे समय से कई मांगें उठा रहे हैं। इनमें शामिल हैं—
कोटेदारों का कहना है कि पहले की तुलना में अब उनकी जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। आधार सत्यापन, ई-पॉस मशीन से वितरण और डिजिटल रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थाओं ने काम का बोझ बढ़ाया है।
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कोटेदार की कमाई पूरी तरह दुकान से जुड़े लाभार्थियों और राशन वितरण की मात्रा पर निर्भर करती है।
हालांकि कोटेदारों का कहना है कि इसमें से दुकान संचालन का खर्च निकालने के बाद बची राशि काफी कम रह जाती है।
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कोटेदारों का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में काम का दायरा काफी बढ़ा है, लेकिन कमीशन में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई। राशन वितरण व्यवस्था में डिजिटल प्रक्रिया आने के बाद जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, जबकि खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। अब सभी की नजर सरकार के फैसले पर है। अगर कोटेदारों की मांगों पर सहमति नहीं बनती है तो आने वाले दिनों में राशन वितरण व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
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