आगे चलकर उन्होंने विधि की शिक्षा हासिल की और वकालत को अपना पेशा बनाया, लेकिन उनका असली मुक़दमा हमेशा इंसान और इंसाफ़ के बीच चलता रहा। अदालत की बहसें, पीड़ित की चुप्पी, और न्याय की तल्ख़ सच्चाइयाँ इन सबका असर उनकी रचनाओं में साफ़ दिखता है।

Diwakar Rahi : दिवाकर राही (रघुवीर सरन 1914–1968) हिंदी के उन महत्वपूर्ण प्रगतिशील कवियों में शामिल हैं, जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्यबोध तक सीमित न रखकर उसे समाज-परिवर्तन का औज़ार बनाया। वे हिंदी कविता के साथ-साथ उर्दू ग़ज़ल-परंपरा में भी समान अधिकार से सक्रिय रहे और दोनों भाषाई धाराओं के बीच सेतु का कार्य किया।
1914 में जन्मे दिवाकर राही (रघुवीर सरन) का रचनात्मक संसार बेहद शुरुआती दिनों से ही आकार लेने लगा था। पढ़ाई के दौर में ही साहित्य के साथ-साथ कानून और समाज की जटिल सच्चाइयाँ उनके भीतर गहरी जिज्ञासा जगाने लगीं। आगे चलकर उन्होंने विधि की शिक्षा हासिल की और वकालत को अपना पेशा बनाया, लेकिन उनका असली मुक़दमा हमेशा इंसान और इंसाफ़ के बीच चलता रहा। अदालत की बहसें, पीड़ित की चुप्पी, और न्याय की तल्ख़ सच्चाइयाँ इन सबका असर उनकी रचनाओं में साफ़ दिखता है। यही वजह है कि उनकी कविता और ग़ज़ल में तर्क की धार भी है, न्याय-बोध की दृढ़ता भी और मानवीय संवेदना की एक ऐसी गर्माहट भी, जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।
1 - ग़ुस्से में बरहमी में ग़ज़ब में इताब में,
ख़ुद आ गए हैं वो मिरे ख़त के जवाब में।

2 - इस दौर-ए-तरक़्क़ी के अंदाज़ निराले हैं,
ज़ेहनों में अँधेरे हैं सड़कों पे उजाले हैं।

3 - सवाल ये है कि इस पुर-फ़रेब दुनिया में,
ख़ुदा के नाम पे किस किस का एहतिराम करें।

4 - इस इंतिज़ार में बैठे हैं उन की महफ़िल में,
कि वो निगाह उठाएँ तो हम सलाम करें।

5 - अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में,
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में। Diwakar Rahi
