दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाराबंकी के रामनगर क्षेत्र में कुम्हार परिवारों के चाक तेजी से घूमने लगे हैं। बड़नपुर ग्राम पंचायत के फिरोजपुर मोहल्ले में करीब 30 वर्षों से मिट्टी के बर्तन बनाने वाले परिवार इन दिनों दीये, कुल्हड़, गुल्लक, मटकी, गगरी और पूजा से जुड़े पारंपरिक सामान तैयार कर रहे हैं।

UP News : दीपावली का त्योहार जैसे-जैसे करीब आ रहा है, वैसे-वैसे बाराबंकी के गांवों में कुम्हारों के चाक की रफ्तार भी बढ़ती जा रही है। रामनगर तहसील क्षेत्र के ग्राम पंचायत बड़नपुर के फिरोजपुर मोहल्ले में इन दिनों दिन-रात मिट्टी को आकार देने का काम चल रहा है। कहीं चाक पर दीये तैयार हो रहे हैं तो कहीं कुल्हड़, गुल्लक, मटकी और पारंपरिक बर्तन बनाए जा रहे हैं। करीब 30 वर्षों से यहां कुम्हार परिवार मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। दीपावली इनके लिए सिर्फ रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि साल में बेहतर कमाई की एक बड़ी उम्मीद भी लेकर आती है।

फिरोजपुर मोहल्ले में इन दिनों कुम्हार परिवार त्योहार की तैयारियों में जुटे हैं। बसंता मुकुंद प्रजापति, गुड्डू प्रजापति, बेचू, झुंगुर, जानकी, रामचंद्र और प्रकाश समेत कई परिवार मिट्टी के दीये और पारंपरिक सामान तैयार कर रहे हैं। चाक पर मिट्टी को आकार देने के बाद तैयार सामान को पहले सुखाया जाता है और फिर भट्ठी में पकाया जाता है। इसके बाद इन्हें बाजार में बिक्री के लिए भेजा जाता है। दीपावली करीब आते ही काम का दबाव बढ़ जाता है और परिवार का हर सदस्य इस काम में हाथ बंटाता है। कुम्हार मुकुंद प्रजापति के मुताबिक मिट्टी के बर्तन बनाने का काम उनके परिवार में करीब सात पीढ़ियों से चला आ रहा है। यह कारोबार उनके लिए केवल कमाई का जरिया नहीं बल्कि पुश्तैनी परंपरा भी है। सामान्य दिनों में मिट्टी के बर्तनों की मांग सीमित रहती है, लेकिन दीपावली के समय दीयों की बिक्री बढ़ जाती है। इसी वजह से त्योहार के दिनों में कुम्हार परिवारों को अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद रहती है। मुकुंद प्रजापति ने बताया कि दीपावली के दौरान करीब 12 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है, जबकि सामान्य दिनों में बिक्री काफी कम रहती है।
फिरोजपुर में इस समय सिर्फ मिट्टी के दीये ही नहीं बनाए जा रहे हैं। कुम्हार परिवार कुल्हड़, गुल्लक, मटकी, गगरी, भुरका, मथना, मलिया और हाथी जैसे पारंपरिक सामान भी तैयार कर रहे हैं। छठ पूजा को देखते हुए कोशी समेत पूजा में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के सामान भी बनाए जा रहे हैं। इससे त्योहारों के साथ जुड़े पारंपरिक मिट्टी के उत्पादों की मांग बढ़ने की उम्मीद है। कुम्हारों की मेहनत और त्योहार से जुड़ी उम्मीदों के बीच सबसे बड़ी समस्या उपयुक्त चिकनी मिट्टी की उपलब्धता की है। बर्तन बनाने के लिए जिस तरह की मिट्टी की जरूरत होती है, वह अब स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध नहीं होती। कुम्हारों को इसके लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में जाना पड़ता है और किसानों से खेत की मिट्टी खरीदनी पड़ती है। इससे उत्पादन की लागत बढ़ जाती है और मेहनत भी पहले के मुकाबले अधिक करनी पड़ती है।
कुम्हार परिवारों ने तहसील प्रशासन से क्षेत्र में चिकनी मिट्टी की उपलब्धता सुनिश्चित कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर उपयुक्त मिट्टी उपलब्ध हो जाए तो उनकी लागत कम हो सकती है और पुश्तैनी कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। दीपावली के दौरान रामनगर और आसपास के गांवों से लोग फिरोजपुर पहुंचकर मिट्टी के दीये और अन्य सामान खरीदते हैं। वहीं स्थानीय बाजारों में भी मिट्टी के दीयों और पारंपरिक बर्तनों की दुकानें सजने लगी हैं। कुम्हारों के लिए दीपावली की यह रौनक केवल बाजार की चहल-पहल नहीं है। चाक पर घूमती मिट्टी के साथ उनकी रोजी-रोटी, परिवार की उम्मीद और सदियों पुरानी परंपरा भी आगे बढ़ रही है। UP News :
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