उत्तर प्रदेश की इस महिला IAS अधिकारी को लेकर इस बार उत्तर प्रदेश का हाईकोर्ट सख्त एक्शन के मूड़ में बताया जा रहा है। हाईकोर्ट की सख्ती का क्या असर होगा यह तो बताना मुश्किल है किन्तु इतना तय है कि इस बार उत्तर प्रदेश की यह चर्चित महिला IAS अधिकारी कानूनी विवाद में घिर गई है।

UP News : उत्तर प्रदेश की एक चर्चित महिला IAS अधिकारी एक बार फिर से चर्चा में है। उत्तर प्रदेश की इस महिला IAS अधिकारी को लेकर इस बार उत्तर प्रदेश का हाईकोर्ट सख्त एक्शन के मूड़ में बताया जा रहा है। हाईकोर्ट की सख्ती का क्या असर होगा यह तो बताना मुश्किल है किन्तु इतना तय है कि इस बार उत्तर प्रदेश की यह चर्चित महिला IAS अधिकारी कानूनी विवाद में घिर गई है। UP News
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश की IAS अधिकारी श्रीमती दुर्गा शक्ति नागपाल से जुड़ा हुआ है। दरअसल इन दिनों उत्तर प्रदेश की चर्चित IAS अधिकारी और देवीपाटन मंडल की आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल एक बार फिर गंभीर विवाद के केंद्र में हैं। इस बार मामला किसी प्रशासनिक कार्रवाई या कानून-व्यवस्था से नहीं, बल्कि गोंडा की एक अदालत में लंबित करीब तीन दशक पुराने भूमि विवाद और वहां की सिविल जज शबीना खान से कथित फोन पर हुई बातचीत से जुड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए दुर्गा शक्ति नागपाल के कथित आचरण को प्रथम दृष्टया न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप से जुड़ा माना है। कोर्ट ने मामले को आपराधिक अवमानना से संबंधित उचित पीठ के समक्ष विचार के लिए भेजने का निर्देश दिया है। UP News
पूरा विवाद गोंडा में वर्ष 1997 से लंबित एक भूमि विवाद से शुरू होता है। यह मामला ज्योति विद्या मंदिर स्कूल और नगर पालिका परिषद, गोंडा के बीच चल रहा है। विवाद कई टुकड़ों में दर्ज नजूल भूमि से संबंधित है। उपलब्ध न्यायिक विवरण के मुताबिक मुकदमा करीब तीन दशक से लंबित है और फिलहाल साक्ष्य के चरण में था। मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी बताया गया है। मंडलायुक्त की ओर से अदालत के समक्ष रखे गए पक्ष के अनुसार संबंधित भूमि सरकारी उपयोग, कार्यालय भवन और अन्य सरकारी उद्देश्यों के लिए आरक्षित थी। आरोप है कि बाद में इस जमीन पर स्कूल भवन का निर्माण हुआ और इसी को लेकर विवाद अदालत पहुंचा। स्कूल की ओर से आरोप लगाया गया कि सरकारी अधिकारी अपने पद का प्रभाव इस्तेमाल कर न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव बना रहे हैं और इसी आधार पर मुकदमे को देवीपाटन मंडल से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की गई थी। UP News
विवाद का सबसे अहम मोड़ 15 जुलाई 2026 को आया। गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान ने जिला जज को एक पत्र देकर मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ हुई कथित फोन बातचीत का विवरण दिया। यह पत्र 4 अगस्त 2026 को लिखा गया था। जज शबीना खान के मुताबिक वह छुट्टी पर थीं। आरोप है कि फोन पर पहले उनकी छुट्टी और उनके वापस आने के समय को लेकर सवाल किए गए। इसके बाद बातचीत के दौरान उनके व्यवहार और न्यायिक भूमिका को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक बातें कही गईं। जज की शिकायत के अनुसार, उन्हें यह भी कहा गया कि शिकायत हाईकोर्ट में की जा सकती है और मुकदमे को दूसरी अदालत में स्थानांतरित कराया जा सकता है। जज ने इस बातचीत को अपने ऊपर दबाव बनाने और डराने की कोशिश के तौर पर लिया तथा मामले को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया। शबीना खान की ओर से दिए गए विवरण के अनुसार, फोन बातचीत में उन्हें वरिष्ठ आईएएस अधिकारी होने का हवाला देते हुए उनके व्यवहार पर सवाल उठाया गया। शिकायत में हाईकोर्ट में शिकायत करने की कथित धमकी और मुकदमे के ट्रांसफर की बात का भी उल्लेख है। यही वह बिंदु है जिस पर हाईकोर्ट ने विशेष गंभीरता दिखाई। अदालत ने माना कि शिकायत में बताई गई बातचीत का लहजा और भाषा प्रथम दृष्टया ऐसा प्रभाव पैदा करती है कि पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
दूसरी तरफ मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने अपने ऊपर लगाए गए कई आरोपों को खारिज किया है। उनकी ओर से कहा गया कि उन्होंने जज को फोन जरूर किया था, लेकिन उनका उद्देश्य किसी भी तरह से न्यायिक प्रक्रिया या मुकदमे के गुण-दोष को प्रभावित करना नहीं था। नागपाल के अनुसार, उन्होंने अप्रैल 2026 में देवीपाटन मंडल का कार्यभार संभालने के बाद इस पुराने सरकारी जमीन के मुकदमे की जानकारी ली थी। उन्हें पता चला कि सरकारी भूमि से संबंधित मामला करीब 30 वर्षों से लंबित है। उनका कहना है कि इसी संदर्भ में वह यह जानना चाहती थीं कि पीठासीन अधिकारी कितने समय तक अवकाश पर रहेंगी और मामले में सरकार की ओर से प्रभावी पैरवी कैसे सुनिश्चित की जाए। उनकी सफाई के मुताबिक फोन पर न तो मुकदमे के गुण-दोष पर चर्चा हुई, न किसी आदेश या फैसले को लेकर बात की गई और न ही केस की मेरिट को प्रभावित करने का कोई प्रयास किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य सरकारी जमीन के हितों की रक्षा और लंबित मुकदमे में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था। UP News
जज शबीना खान की शिकायत के बाद जिला जज, गोंडा ने संबंधित मुकदमे को उसी जिले की समान अधिकार क्षेत्र वाली दूसरी अदालत में स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद स्कूल की ओर से हाईकोर्ट में दायर ट्रांसफर याचिका का मूल उद्देश्य समाप्त हो गया, क्योंकि जिस राहत की मांग की गई थी, वह जिला जज के आदेश से मिल चुकी थी। लेकिन हाईकोर्ट ने साफ किया कि मुकदमे का ट्रांसफर हो जाने से फोन कॉल और उससे जुड़े गंभीर आरोप समाप्त नहीं हो जाते। अदालत ने कहा कि वह न्यायिक अधिकारी की ओर से लगाए गए आरोपों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा बताई गई बातचीत की भाषा और लहजा प्रथम दृष्टया पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश का संकेत देता है। अदालत ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि किसी लंबित मुकदमे के संदर्भ में कोई पक्ष न्यायाधीश से इस तरह फोन पर संपर्क कैसे कर सकता है। कोर्ट ने अधीनस्थ न्यायालयों को किसी भी प्रकार के अपमान, दबाव या भय से सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत के अनुसार न्यायिक अधिकारियों को बिना किसी भय या दबाव के अपने न्यायिक दायित्व निभाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। UP News
हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को प्रथम दृष्टया इतना गंभीर माना कि दुर्गा शक्ति नागपाल के कथित आचरण को आपराधिक अवमानना से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली उचित अदालत के समक्ष विचार के लिए भेजने का निर्देश दिया। इसके लिए मुख्य न्यायाधीश या संबंधित वरिष्ठ न्यायाधीश से आवश्यक दिशा-निर्देश लेने को कहा गया है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के In Re: Ajay Kumar Pandey (1996) मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें न्यायिक कार्यवाही से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों पर धमकी या दबाव डालने के प्रयासों को गंभीरता से देखा गया था। दुर्गा शक्ति नागपाल उत्तर प्रदेश कैडर की 2010 बैच की आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में देवीपाटन मंडल की मंडलायुक्त हैं। इससे पहले भी वह उत्तर प्रदेश की चर्चित प्रशासनिक अधिकारियों में रही हैं। 2013 में गौतमबुद्ध नगर की एसडीएम सदर के तौर पर अवैध बालू खनन के खिलाफ कार्रवाई के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई थीं। उनकी पहचान एक सख्त और सक्रिय प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर बनी है। ऐसे में इस बार विवाद का केंद्र न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की संवेदनशील सीमा है। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने मामले को सामान्य प्रशासनिक विवाद से कहीं अधिक गंभीर बना दिया है। UP News
विज्ञापन