दुनिया उन्हें “फ़िराक़ गोरखपुरी” के नाम से पहचानती है एक ऐसा शायर, जिसने शब्दों को सिर्फ़ सजाया नहीं, बल्कि उनमें इंसानी एहसासों की धड़कन भर दी। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक कायस्थ परिवार में जन्मे फ़िराक़ का साहित्य से नाता बचपन से ही जुड़ गया था।

Firaq Gorakhpuri : रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी (28 अगस्त 1896–3 मार्च 1982) उर्दू शायरी के उस चमकते नाम हैं, जिनकी ग़ज़लों में इश्क़ की नज़ाकत भी मिलती है और ज़िंदगी की गहरी समझ भी। दुनिया उन्हें “फ़िराक़ गोरखपुरी” के नाम से पहचानती है एक ऐसा शायर, जिसने शब्दों को सिर्फ़ सजाया नहीं, बल्कि उनमें इंसानी एहसासों की धड़कन भर दी। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक कायस्थ परिवार में जन्मे फ़िराक़ का साहित्य से नाता बचपन से ही जुड़ गया था। अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी की पढ़ाई ने उनकी सोच को व्यापक बनाया, इसलिए उनकी शायरी में एक तरफ़ क्लासिकी रवायत की ख़ुशबू मिलती है तो दूसरी तरफ़ आधुनिक संवेदना की ताज़गी। यही वजह रही कि उन्होंने उर्दू अदब में अपनी अलग पहचान बनाई और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के अध्यापक रहते हुए भी अपनी रचनाओं से ऐसा असर छोड़ा, जो आज भी पाठकों के दिलों में उतना ही ज़िंदा है।
29 जून 1914 को फ़िराक़ का विवाह प्रसिद्ध जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की पुत्री किशोरी देवी से हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा शुरुआती दौर में ही सामने आ गई थी। कला स्नातक में प्रदेश स्तर पर चौथा स्थान प्राप्त करने के बाद उनका चयन आई.सी.एस. के लिए हुआ। लेकिन 1920 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर स्वराज्य आंदोलन का रास्ता चुना। आज़ादी की उस लड़ाई में उनकी हिस्सेदारी महज विचारों तक सीमित नहीं रही, उन्हें करीब डेढ़ वर्ष की जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। जेल से रिहाई के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यालय में अवर सचिव के रूप में जिम्मेदारी दिलाई। हालांकि, नेहरू के यूरोप रवाना होने के बाद फ़िराक़ ने यह पद छोड़ दिया और फिर उन्होंने शिक्षण जगत में अपनी स्थायी भूमिका चुन ली।
1 एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

2 - शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास,
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं

3 बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

4 - ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त,
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

5 - मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर,
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर
