क्या नकली शंकराचार्य हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, सवाल बहुत बड़ा है
इस सच्चाई को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद उजागर किया है। यह सच्चाई शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के प्रशासन को लंबा पत्र लिखकर उजागर की है।

UP News : उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद बड़ी चर्चा का विषय बने हुए हैं। तमाम विवादों तथा चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। उत्तर प्रदेश में खड़ा हुआ बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद एक नकली शंकराचार्य हैं ? उत्तर प्रदेश की सरकार को लगातार चुनौती देने वाले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मामले में एक ताजा सच्चाई सामने आई है। इस सच्चाई को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद उजागर किया है। यह सच्चाई शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के प्रशासन को लंबा पत्र लिखकर उजागर की है।
अंग्रेजी में पत्र लिखकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने उजागर की है सच्चाई
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के पत्र से पहले एक दूसरे पत्र की चर्चा करना जरूरी है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेला प्रशासन ने मंगलवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक पत्र भेजा था। पत्र में जवाब मांगा गया था कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने आप को शंकराचार्य कैसे और क्यों बता रहे हैं। इस पत्र के जवाब में अविमुक्तेश्वरनंद ने उत्तर प्रदेश के माघ मेला प्रशासन को आठ पेज का पत्र भेजा है। यह पूरा पत्र अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि उनके सहयोगी पत्र का जवाब लेकर माघ मेला प्रशासन के कार्यालय में गए थे वहां किसी भी अधिकारी ने उनका पत्र रिसीव नहीं किया। इस कारण उस पत्र को माघ मेला प्रशासन के कार्यालय के बाहर चस्पा कर दिया गया। साथ ही ईमेल के द्वारा भी पत्र भेजा गया है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से वकील ने लिखा पत्र
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेला के प्रशासन को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से भेजा गया पत्र उनके वकील अंजनी कुमार मिश्रा ने लिखा है। इस पत्र में उत्तर प्रदेश के माघ मेला प्रशासन के द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लिखे गए पत्र को अपमानजनक के साथ-साथ इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ करने वाला भी बताया गया है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के वकील पीएन मिश्रा ने अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से जवाब देते हुए कहा गया कि जो सिविल अपील का हवाला दिया गया उसमें 14 अक्टूबर 2022 में आदेश दिया गया था. जिसका हवाला प्रशासन दे रहा है. उसके पहले 21 सितंबर 2022 का ऑर्डर है. जिसके ऑर्डर में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बताया गया था. पञ में कहा गया है कि स्वामी का पट्टाभिषेक तो 12 अक्टूबर 2022 को ही हो चुका था. जो ऑर्डर सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन बता रहा वो 17 अक्टूबर का है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक पहले ही हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में ही कई जगह शंकराचार्य लिखा है. प्रशासन के अफसरों ने जो नोटिस भेजी है वो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना बनता है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर के बाद किसी पट्टाभिषेक पर रोक लगाई है.
भारत में कौन बनता है शंकराचार्य ?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य वाले विवाद के दौरान उत्तर प्रदेश के बहुत सारे नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि भारत में शंकराचार्य कौन बनता है ? आपको बता दें कि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, आदि शंकराचार्य ने मठों की शुरुआत की थी। वह हिंदू दार्शनिक और धर्मगुरु थे, इन्हें जगदगुरु के नाम से भी जाना जाता है, जो सनातन धर्म की रक्षा और प्रसार करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने प्रमुख चार शिष्यों को देश के चार दिशाओं में स्थापित किए गए मठों की जिम्मेदारी दी। इन मठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है। सनातन धर्म में शंकराचार्य को सर्वोच्च माना जाता है।
सनातन धर्म के मुताबिक, मठ में गुरु अपने शिष्यों को सनातन धर्म की शिक्षा और ज्ञान देते हैं। यह आध्यात्मिक शिक्षा होती है। हालांकि, इसके साथ ही, मठों में जीवन के कुछ अहम पहलू, सामाजिक सेवा, साहित्य आदि का भी ज्ञान देते हैं। मठ एक ऐसा शब्द है जिसके बहुधार्मिक अर्थ हैं। देश में चार प्रमुख मठ द्वारका, ज्योतिष, गोवर्धन और शृंगेरी पीठ है। दरअसल, संस्कृत में मठों को ही पीठ कहा जाता है।
किस प्रकार होता है शंकराचार्य का चयन
शंकराचार्य के पद पर बैठने वाले व्यक्ति को त्यागी, दंडी संन्यासी, संस्कृत, चतुर्वेद, वेदांत ब्राह्मण, ब्रह्मचारी और पुराणों का ज्ञान होना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, उन्हें अपने गृहस्थ जीवन, मुंडन, पिंडदान और रूद्राक्ष धारण करना काफी अहम माना जाता है। शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य है, जिन्हें चारों वेद और छह वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए। जिन्हें शंकराचार्य बनाया जाता है, उन्हें अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति के साथ और काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति की मुहर भी चाहिए होती है। इसके बाद ही शंकराचार्य की पदवी मिलती है।गोवर्धन मठ: ओडिशा के पुरी राज्य में गोवर्धन मठ स्थापित है। गोवर्धन मठ के संन्यासियों के नाम के बाद 'अरण्य' सम्प्रदाय नाम लगाया जाता है। निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के शंकराचार्य हैं। इस मठ के अन्तर्गत 'ऋग्वेद' को इसके अंतर्गत रखा गया है। गोवर्धन मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद आचार्य थे।
शारदा मठ : शारदा मठ, गुजरात के द्वारकाधाम में शारदा मठ स्थित है। सदानंद सरस्वती ही शारदा मठ के शंकराचार्य हैं। इस मठ के संन्यासियों के नाम के बाद तीर्थ या आश्रम लगाया जाता है। इस मठ के अंतर्गत 'सामवेद' को रखा गया है। शारदा मठ के पहले मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे।
ज्योतिर्मठ : उत्तराखंड के बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ स्थित है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस मठ के शंकराचार्य हैं। ज्योर्तिमठ के संन्यासियों के नाम के बाद सागर का प्रयोग किया जाता है। अथर्ववेद को इस मठ के अंतर्गत रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश त्रोटकाचार्य थे।
शृंगेरी मठ : दक्षिण भारत के रामेश्वरम में शृंगेरी मठ स्थापित है। इस मठ के संन्यासियों के नाम के पीछे सरस्वती या भारती लगाया जाता है। जगद्गुरु भारती तीर्थ इस मठ के शंकराचार्य हैं। इस मठ के अंतर्गत यजुर्वेद को रखा गया है। बता दें कि मठ के पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वराचार्य थे। UP News
UP News : उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद बड़ी चर्चा का विषय बने हुए हैं। तमाम विवादों तथा चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। उत्तर प्रदेश में खड़ा हुआ बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद एक नकली शंकराचार्य हैं ? उत्तर प्रदेश की सरकार को लगातार चुनौती देने वाले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मामले में एक ताजा सच्चाई सामने आई है। इस सच्चाई को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद उजागर किया है। यह सच्चाई शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के प्रशासन को लंबा पत्र लिखकर उजागर की है।
अंग्रेजी में पत्र लिखकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने उजागर की है सच्चाई
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के पत्र से पहले एक दूसरे पत्र की चर्चा करना जरूरी है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेला प्रशासन ने मंगलवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक पत्र भेजा था। पत्र में जवाब मांगा गया था कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने आप को शंकराचार्य कैसे और क्यों बता रहे हैं। इस पत्र के जवाब में अविमुक्तेश्वरनंद ने उत्तर प्रदेश के माघ मेला प्रशासन को आठ पेज का पत्र भेजा है। यह पूरा पत्र अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि उनके सहयोगी पत्र का जवाब लेकर माघ मेला प्रशासन के कार्यालय में गए थे वहां किसी भी अधिकारी ने उनका पत्र रिसीव नहीं किया। इस कारण उस पत्र को माघ मेला प्रशासन के कार्यालय के बाहर चस्पा कर दिया गया। साथ ही ईमेल के द्वारा भी पत्र भेजा गया है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से वकील ने लिखा पत्र
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेला के प्रशासन को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से भेजा गया पत्र उनके वकील अंजनी कुमार मिश्रा ने लिखा है। इस पत्र में उत्तर प्रदेश के माघ मेला प्रशासन के द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लिखे गए पत्र को अपमानजनक के साथ-साथ इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ करने वाला भी बताया गया है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के वकील पीएन मिश्रा ने अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से जवाब देते हुए कहा गया कि जो सिविल अपील का हवाला दिया गया उसमें 14 अक्टूबर 2022 में आदेश दिया गया था. जिसका हवाला प्रशासन दे रहा है. उसके पहले 21 सितंबर 2022 का ऑर्डर है. जिसके ऑर्डर में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बताया गया था. पञ में कहा गया है कि स्वामी का पट्टाभिषेक तो 12 अक्टूबर 2022 को ही हो चुका था. जो ऑर्डर सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन बता रहा वो 17 अक्टूबर का है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक पहले ही हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में ही कई जगह शंकराचार्य लिखा है. प्रशासन के अफसरों ने जो नोटिस भेजी है वो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना बनता है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर के बाद किसी पट्टाभिषेक पर रोक लगाई है.
भारत में कौन बनता है शंकराचार्य ?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य वाले विवाद के दौरान उत्तर प्रदेश के बहुत सारे नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि भारत में शंकराचार्य कौन बनता है ? आपको बता दें कि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, आदि शंकराचार्य ने मठों की शुरुआत की थी। वह हिंदू दार्शनिक और धर्मगुरु थे, इन्हें जगदगुरु के नाम से भी जाना जाता है, जो सनातन धर्म की रक्षा और प्रसार करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने प्रमुख चार शिष्यों को देश के चार दिशाओं में स्थापित किए गए मठों की जिम्मेदारी दी। इन मठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है। सनातन धर्म में शंकराचार्य को सर्वोच्च माना जाता है।
सनातन धर्म के मुताबिक, मठ में गुरु अपने शिष्यों को सनातन धर्म की शिक्षा और ज्ञान देते हैं। यह आध्यात्मिक शिक्षा होती है। हालांकि, इसके साथ ही, मठों में जीवन के कुछ अहम पहलू, सामाजिक सेवा, साहित्य आदि का भी ज्ञान देते हैं। मठ एक ऐसा शब्द है जिसके बहुधार्मिक अर्थ हैं। देश में चार प्रमुख मठ द्वारका, ज्योतिष, गोवर्धन और शृंगेरी पीठ है। दरअसल, संस्कृत में मठों को ही पीठ कहा जाता है।
किस प्रकार होता है शंकराचार्य का चयन
शंकराचार्य के पद पर बैठने वाले व्यक्ति को त्यागी, दंडी संन्यासी, संस्कृत, चतुर्वेद, वेदांत ब्राह्मण, ब्रह्मचारी और पुराणों का ज्ञान होना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, उन्हें अपने गृहस्थ जीवन, मुंडन, पिंडदान और रूद्राक्ष धारण करना काफी अहम माना जाता है। शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य है, जिन्हें चारों वेद और छह वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए। जिन्हें शंकराचार्य बनाया जाता है, उन्हें अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति के साथ और काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति की मुहर भी चाहिए होती है। इसके बाद ही शंकराचार्य की पदवी मिलती है।गोवर्धन मठ: ओडिशा के पुरी राज्य में गोवर्धन मठ स्थापित है। गोवर्धन मठ के संन्यासियों के नाम के बाद 'अरण्य' सम्प्रदाय नाम लगाया जाता है। निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के शंकराचार्य हैं। इस मठ के अन्तर्गत 'ऋग्वेद' को इसके अंतर्गत रखा गया है। गोवर्धन मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद आचार्य थे।
शारदा मठ : शारदा मठ, गुजरात के द्वारकाधाम में शारदा मठ स्थित है। सदानंद सरस्वती ही शारदा मठ के शंकराचार्य हैं। इस मठ के संन्यासियों के नाम के बाद तीर्थ या आश्रम लगाया जाता है। इस मठ के अंतर्गत 'सामवेद' को रखा गया है। शारदा मठ के पहले मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे।
ज्योतिर्मठ : उत्तराखंड के बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ स्थित है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस मठ के शंकराचार्य हैं। ज्योर्तिमठ के संन्यासियों के नाम के बाद सागर का प्रयोग किया जाता है। अथर्ववेद को इस मठ के अंतर्गत रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश त्रोटकाचार्य थे।
शृंगेरी मठ : दक्षिण भारत के रामेश्वरम में शृंगेरी मठ स्थापित है। इस मठ के संन्यासियों के नाम के पीछे सरस्वती या भारती लगाया जाता है। जगद्गुरु भारती तीर्थ इस मठ के शंकराचार्य हैं। इस मठ के अंतर्गत यजुर्वेद को रखा गया है। बता दें कि मठ के पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वराचार्य थे। UP News












