हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘भाई जी’ की जयंती पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने श्रद्धांजलि दी। जानें गीता प्रेस, ‘कल्याण’ और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े उनके जीवन और योगदान की पूरी कहानी।

सनातन साहित्य को घर-घर पहुंचाने और भारतीय जनमानस को उसकी आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ने वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘भाई जी’ की जयंती पर देश उन्हें श्रद्धा से याद कर रहा है। गीता प्रेस गोरखपुर से लेकर ‘कल्याण’ पत्रिका तक, उनका जीवन धर्म, संस्कृति, साहित्य और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित रहा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर ‘भाई जी’ को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद किया। लेकिन आखिर वह कौन-सा व्यक्तित्व था, जिसने आध्यात्मिक साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने का इतना बड़ा अभियान खड़ा किया? स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर गीता प्रेस और ‘कल्याण’ तक उनकी यात्रा कई ऐसे पहलुओं से भरी है, जिन्हें जानना बेहद दिलचस्प है।
हनुमान प्रसाद पोद्दार को लोग स्नेह से ‘भाई जी’ और ‘प्यारा भाई’ के नाम से जानते थे। उनका जीवन आध्यात्मिक साधना, साहित्य और सामाजिक सेवा से जुड़ा रहा। गोरखपुर उनकी कर्मभूमि बनी और यहीं से उन्होंने धार्मिक एवं आध्यात्मिक साहित्य को आम लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गीता प्रेस के साथ उनका नाम विशेष रूप से जुड़ा रहा। उनका सबसे प्रमुख परिचय ‘कल्याण’ पत्रिका के आदि संपादक के रूप में सामने आता है। गीता प्रेस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ‘कल्याण’ धर्म, अध्यात्म, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सदाचार जैसे विषयों के प्रसार के लिए समर्पित पत्रिका रही है और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने इसे अपने संपादन से एक विशिष्ट पहचान दी।
हनुमान प्रसाद पोद्दार की जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में उन्हें ‘कल्याण’ का आदि संपादक, महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और भारतीय जनमानस को उसकी आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ने वाला व्यक्तित्व बताया। सीएम योगी ने कहा कि धर्म, संस्कृति और राष्ट्रोत्थान को समर्पित हनुमान प्रसाद पोद्दार का तपस्वी जीवन, निष्काम सेवा और आध्यात्मिक दृष्टि सांस्कृतिक चेतना की अमूल्य धरोहर है। मुख्यमंत्री के इस संदेश में ‘भाई जी’ के साहित्यिक और आध्यात्मिक योगदान को विशेष रूप से याद किया गया है। 7 अक्टूबर 2026 को उनकी जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री की श्रद्धांजलि की पुष्टि उपलब्ध समकालीन रिपोर्ट में भी होती है।
गोरखपुर स्थित गीता प्रेस का उद्देश्य सनातन धर्म और धार्मिक साहित्य से जुड़े ग्रंथों को आम लोगों तक पहुंचाना रहा है। गीता प्रेस की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, संस्था गीता, रामायण, उपनिषद, पुराण और संतों के प्रवचनों सहित विभिन्न धार्मिक एवं चरित्र निर्माण से जुड़ी पुस्तकों का प्रकाशन करती है। हनुमान प्रसाद पोद्दार का गीता प्रेस के कामकाज और आध्यात्मिक साहित्य के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाने के प्रयासों को आगे बढ़ाया। इसी वजह से गीता प्रेस और ‘भाई जी’ का नाम एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है।
‘कल्याण’ पत्रिका हनुमान प्रसाद पोद्दार के जीवन और कार्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही। गीता प्रेस की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, पत्रिका की शुरुआत 1920 के दशक में हुई और यह धर्म, अध्यात्म, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य तथा सदाचार से जुड़े विषयों के प्रसार के लिए समर्पित रही है। ‘कल्याण’ को लोकप्रिय बनाने और इसकी संपादकीय दिशा तय करने में हनुमान प्रसाद पोद्दार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। गीता प्रेस उन्हें पत्रिका का आदि संपादक बताता है। लंबे समय से प्रकाशित यह पत्रिका आज भी धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए है।
हनुमान प्रसाद पोद्दार का जीवन केवल धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य तक सीमित नहीं था। उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में भी याद किया जाता है। युवावस्था में वह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े और स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी सक्रियता रही। बाद के वर्षों में उन्होंने साहित्य और आध्यात्मिक लेखन को अपने जीवन का प्रमुख माध्यम बनाया। उनके लेखन में भक्ति, आत्मचिंतन, नैतिक जीवन और भारतीय संस्कृति जैसे विषय प्रमुख रहे। इस तरह उनका व्यक्तित्व आध्यात्मिक साधना, साहित्य और राष्ट्रभावना के अलग-अलग पक्षों को जोड़ता दिखाई देता है।
हनुमान प्रसाद पोद्दार ने भक्ति, आत्मचिंतन और सनातन संस्कृति से जुड़े विषयों पर बड़ी संख्या में लेखन किया। उनकी चर्चित रचनाओं में ‘सत्संग के बिखरे मोती’, ‘दाम्पत्य जीवन का आदर्श’ और ‘साधकों के पत्र’ जैसे नाम बताए जाते हैं। उनकी लेखन शैली का उद्देश्य केवल धार्मिक जानकारी देना नहीं था, बल्कि पाठकों को आत्मचिंतन और नैतिक जीवन की ओर प्रेरित करना भी था। इसी वजह से ‘भाई जी’ का साहित्य लंबे समय तक पाठकों के बीच लोकप्रिय रहा।
हनुमान प्रसाद पोद्दार का निधन 22 मार्च 1971 को हुआ, लेकिन उनके द्वारा किए गए साहित्यिक और आध्यात्मिक कार्यों की विरासत आज भी दिखाई देती है। गीता प्रेस और ‘कल्याण’ के जरिए धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य की जो परंपरा उन्होंने मजबूत की, वह आगे भी जारी रही। गीता प्रेस के अनुसार, जनवरी 2026 तक ‘कल्याण’ की लगभग 17 करोड़ 50 लाख प्रतियां प्रकाशित हो चुकी थीं। उनकी स्मृति में भारत सरकार ने 1992 में डाक टिकट भी जारी किया था। इस तरह ‘भाई जी’ का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि साहित्य, आध्यात्मिकता और भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी एक लंबी यात्रा के रूप में याद किया जाता है।
हनुमान प्रसाद पोद्दार का जीवन इस बात का उदाहरण है कि साहित्य और प्रकाशन के माध्यम से भी समाज में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया जा सकता है। गीता प्रेस और ‘कल्याण’ से उनका जुड़ाव इसी दिशा में उनके योगदान को दर्शाता है। आज उनकी जयंती पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की श्रद्धांजलि के साथ एक बार फिर ‘भाई जी’ का नाम चर्चा में है। उनका जीवन, उनका लेखन और आध्यात्मिक साहित्य के प्रसार का उनका प्रयास उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बना हुआ है, जो भारतीय संस्कृति और सनातन साहित्य की परंपरा को समझना चाहते हैं।
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