हरीश राणा की मौत के छह महीने बाद भी उनके बुजुर्ग माता-पिता पेंशन और आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। परिवार अब CM योगी के जनता दरबार में अपनी फरियाद रखने की तैयारी में है।

UP News : कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं, जिनका अंत दिखाई तो देता है, लेकिन वे वास्तव में खत्म नहीं होते। हरीश राणा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। करीब 13 वर्षों तक अपने बेटे को जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए देखने वाले माता-पिता ने आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद उसे विदा किया। लेकिन बेटे की मौत के करीब छह महीने बाद भी बुजुर्ग अशोक राणा और उनकी पत्नी निर्मला देवी का संघर्ष जारी है। अब उनकी लड़ाई बेटे के इलाज के लिए नहीं, बल्कि अपने बुढ़ापे की जिंदगी और आजीविका के सहारे के लिए है। परिवार का आरोप है कि उन्हें पेंशन और स्थायी दुकान उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन इन मामलों में उन्हें अभी भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। अब हरीश राणा के माता-पिता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जनता दरबार में अपनी बात रखने की तैयारी कर रहे हैं।
हरीश राणा वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान वह पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। हादसे में उनके सिर में गंभीर चोट आई और इसके बाद वह स्थायी अचेत अवस्था में चले गए। इसके बाद शुरू हुआ परिवार का ऐसा संघर्ष, जो करीब 13 साल तक चला। गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन स्थित घर में माता-पिता ने अपने बेटे की देखभाल के लिए घर को ही अस्पताल बना दिया था। पिता अशोक राणा सुबह करीब 4:30 बजे उठकर बेटे की फिजियोथेरेपी करते थे। मां निर्मला देवी भी लगातार उसकी देखभाल में जुटी रहती थीं। परिवार के अनुसार, हरीश के इलाज में उनकी पूरी जमा-पूंजी तक खत्म हो गई और इलाज के लिए दिल्ली का मकान भी बेचना पड़ा। UP News :
लगातार वर्षों तक इलाज और देखभाल के बावजूद जब हरीश की स्थिति में सुधार की उम्मीद नहीं बची, तब माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में जीवन रक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी। इसके बाद दिल्ली के एम्स में चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत जीवन रक्षक प्रणाली हटाई गई और 24 मार्च 2026 को हरीश का निधन हो गया। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला जीवन रक्षक उपचार हटाने से संबंधित था, न कि सक्रिय रूप से किसी व्यक्ति की जान लेने की अनुमति। हरीश राणा का मामला देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में दर्ज हुआ। हरीश के माता-पिता के लिए अपने बेटे को विदा करना 13 साल की पीड़ा का सबसे कठिन क्षण था। लेकिन इसके बाद उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम अपने बुढ़ापे के लिए शासन-प्रशासन की ओर से मिला आश्वासन पूरा होगा। परिवार का कहना है कि शासन की ओर से आर्थिक सहायता मिली और प्रशासन ने आजीविका के लिए कियोस्क भी उपलब्ध कराया। वहीं दूसरी ओर परिवार का आरोप है कि जिस स्थायी दुकान और नियमित पेंशन की उम्मीद उन्हें थी, वह व्यवस्था अभी पूरी तरह उनके सामने नहीं आ सकी है।
अशोक राणा के मुताबिक, परिवार की आजीविका के लिए एक पक्की कमर्शियल दुकान उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। उनका आरोप है कि इसके बजाय उन्हें छोटा कियोस्क या स्टॉल दिया गया है। बुजुर्ग माता-पिता का कहना है कि बढ़ती उम्र में उनके लिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिससे उन्हें नियमित आय मिल सके और किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े। उनकी मांग को परिवार ने मदद नहीं बल्कि अपने जीवनयापन के अधिकार से जोड़कर रखा है।
परिवार के अनुसार, हरीश की वर्षों तक देखभाल करने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। ऐसे में बुजुर्ग माता-पिता के लिए नियमित आर्थिक सहायता बेहद महत्वपूर्ण है। परिवार का आरोप है कि पेंशन से जुड़ी प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है और उन्हें कागजी कार्रवाई के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। छह महीने बाद भी समस्या पूरी तरह हल न होने से अब परिवार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जनता दरबार में अपनी फरियाद रखने की तैयारी कर रहा है।
हरीश की मां निर्मला देवी ने 13 साल तक अपने बेटे को सुइयों, दवाइयों और जीवन रक्षक उपकरणों के बीच देखा। बेटे के ठीक होने की उम्मीद खत्म होने के बाद भी माता-पिता ने उसका साथ नहीं छोड़ा। हरीश के निधन के बाद परिवार ने उसके अंगदान का फैसला भी किया। परिवार के अनुसार, बेटे की आंखें और हृदय आज भी किसी दूसरे इंसान के जीवन का हिस्सा हैं। यही बात इस दर्दनाक कहानी में एक मानवीय पक्ष भी जोड़ती है। UP News :
हरीश राणा के पिता अशोक राणा अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलना चाहते हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उनका उद्देश्य केवल शिकायत करना नहीं है। वह शासन और प्रशासन की ओर से मिली मदद के लिए मुख्यमंत्री का धन्यवाद भी करना चाहते हैं और साथ ही अपनी पेंशन तथा आजीविका से जुड़े मुद्दे उनके सामने रखना चाहते हैं। हरीश राणा की कहानी का एक अध्याय 24 मार्च 2026 को समाप्त हुआ था, लेकिन उनके माता-पिता की कहानी अभी जारी है। 13 साल तक बेटे को संभालने वाले ये बुजुर्ग अब अपने बचे हुए जीवन के लिए एक स्थायी सहारे की तलाश में हैं। उनका सवाल सीधा है—जिस बेटे की सेवा में जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा लगा दिया, उसके जाने के बाद क्या बुढ़ापे में उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?
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