अदालत ने साफ कहा है कि धोखाधड़ी के जरिए सरकारी नौकरी पाने वालों को किसी भी हाल में संरक्षण नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि पूरे प्रदेश में ऐसे शिक्षकों की पहचान के लिए राज्यव्यापी जांच अभियान चलाया जाए और यह प्रक्रिया छह महीने के भीतर अनिवार्य रूप से पूरी की जाए।

UP News : उत्तर प्रदेश में जाली दस्तावेजों के आधार पर शिक्षक पद हासिल करने के मामलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि धोखाधड़ी के जरिए सरकारी नौकरी पाने वालों को किसी भी हाल में संरक्षण नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि पूरे प्रदेश में ऐसे शिक्षकों की पहचान के लिए राज्यव्यापी जांच अभियान चलाया जाए और यह प्रक्रिया छह महीने के भीतर अनिवार्य रूप से पूरी की जाए।
जांच के दौरान जिन शिक्षकों के शैक्षणिक या प्रशिक्षण से जुड़े प्रमाणपत्र फर्जी, जाली या गलत पाए जाएंगे, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। अदालत के आदेश के अनुसार ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति तत्काल प्रभाव से निरस्त की जाएगी। अब तक उन्हें दिया गया पूरा वेतन वापस वसूला जाएगा। आवश्यक होने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।
यह जांच उन सभी शिक्षकों पर लागू होगी जिनकी नियुक्ति के दौरान फर्जी डिग्री या प्रमाणपत्र का उपयोग किया गया। गलत आरक्षण श्रेणी का लाभ लिया गया। प्रशिक्षण या पात्रता से जुड़े दस्तावेजों में गड़बड़ी की गई। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि फर्जीवाड़े के जरिए सरकारी सेवा में आना न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि इससे योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का भी हनन होता है। ऐसे मामलों में नरमी बरतना जनहित के खिलाफ होगा।
अदालत के निदेर्शों के बाद अब राज्य सरकार पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह पारदर्शी और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे, ताकि शिक्षा व्यवस्था में भरोसा कायम रह सके और दोषियों को सजा मिले। हाईकोर्ट के इस फैसले से साफ संकेत मिलता है कि अब फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी नौकरी पाने वालों के लिए रास्ता बंद हो चुका है। आने वाले समय में यह कार्रवाई प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।