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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर एक अहम और सख्त फैसला सुनाया है अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल “शांति भंग की आशंका” के आधार पर किसी भी नागरिक को मनमाने तरीके से हिरासत में लेना या जेल भेजना अब स्वीकार्य नहीं होगा।

UP News : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर एक अहम और सख्त फैसला सुनाया है अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल “शांति भंग की आशंका” के आधार पर किसी भी नागरिक को मनमाने तरीके से हिरासत में लेना या जेल भेजना अब स्वीकार्य नहीं होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि "कई पुलिस अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि उनके गलत और गैरकानूनी कृत्यों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा।" अदालत ने कहा कि व्यवस्था में यह धारणा बन गई है कि हजारों उल्लंघनों में से बहुत कम लोग ही अपने अधिकारों को लागू कराने और अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने के लिए आगे आते हैं। UP News
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने एक अहम फैसले में अवैध हिरासत के शिकार व्यक्ति को 25,000 रुपये का अंतरिम मुआवज़ा देने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता को मात्र एक घरेलू विवाद के आधार पर लगभग 24 घंटे तक गैरकानूनी तरीके से पुलिस लॉकअप में रखा गया था। अपने 16 पन्नों के विस्तृत आदेश में अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब कोई नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय आता है, तो यह अदालत का कर्तव्य है कि उन अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू कराए, जो उसे संविधान, कानून और राज्य की नीतियों के तहत पहले से प्राप्त हैं। बेंच ने यह भी कहा कि कई अधिकारी इस भ्रम में रहते हैं कि उनके उल्लंघन अक्सर अनदेखे रह जाएंगे, जो न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। UP News
26 नवंबर 2022 को प्रयागराज निवासी मतंबर मिश्रा अपने खेत से घर लौटे थे। आरोप है कि इसी दौरान एक पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी उपनिरीक्षक सूर्य प्रकाश दुबे उनके घर में घुस गए और उन्हें जबरन घसीटकर बाहर ले आए, जबकि वे केवल लुंगी और कुर्ते में थे। इसके बाद उन्हें बिना किसी स्पष्ट कारण के थाने ले जाकर लगभग 24 घंटे तक लॉकअप में रखा गया। याचिकाकर्ता का आरोप था कि इस दौरान उपनिरीक्षक ने उन्हें छोड़ने के बदले 20,000 रुपये की रिश्वत भी मांगी। यह पूरी कार्रवाई याचिकाकर्ता के भाई की बहू द्वारा दर्ज एक घरेलू विवाद की शिकायत के आधार पर की गई थी, जिसमें किसी भी संज्ञेय अपराध का उल्लेख नहीं था। पुलिस अधिकारी ने अपने बचाव में दलील दी कि याचिकाकर्ता स्वयं समझौते के लिए चौकी आए थे। लेकिन अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। बेंच ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि संबंधित उपनिरीक्षक कोई “आध्यात्मिक गुरु या पंचायत स्तर के मध्यस्थ” नहीं थे, जिनके पास लोग स्वेच्छा से विवाद सुलझाने जाते हैं। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी के पास राज्य की शक्ति होती है, जिससे नागरिकों में भय उत्पन्न होना स्वाभाविक है, इसलिए यह मानना असंभव है कि याचिकाकर्ता स्वेच्छा से वहां गए होंगे। UP News
अदालत ने यह भी गंभीर रूप से नोट किया कि याचिकाकर्ता की रिहाई के दो दिन बाद CrPC की धारा 107 और 116 के तहत कार्रवाई शुरू की गई, जिसे अदालत ने अवैध हिरासत को ढकने की कोशिश बताया। बेंच ने कहा कि ये प्रावधान सार्वजनिक शांति और व्यवस्था से जुड़े मामलों के लिए हैं, और इनका उपयोग घरेलू विवाद जैसे निजी मामलों में नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसे “घबराहट में उठाया गया कदम” बताया। अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट द्वारा बिना पर्याप्त जांच के नोटिस जारी किए जाने पर अदालत ने उनकी बिना शर्त माफी स्वीकार की। अदालत ने माना कि पूरी प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरती गई।अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह मामला सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इसके साथ ही अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में आर्थिक मुआवजा आवश्यक है, क्योंकि केवल प्रशासनिक चेतावनी या निंदा प्रभावी रोकथाम नहीं बन सकती। UP News
उत्तर प्रदेश सरकार की 2021 की नीति का हवाला देते हुए अदालत ने अवैध हिरासत के लिए 25,000 रुपये का मुआवज़ा और 10,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार चाहे तो यह राशि संबंधित दोषी पुलिस अधिकारी से वसूल सकती है, जिसमें वेतन से कटौती भी शामिल हो सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता भविष्य में अलग से दीवानी मुकदमा दायर कर अतिरिक्त मुआवज़े की मांग करने के लिए स्वतंत्र हैं, हालांकि उसमें पहले दिए गए अंतरिम मुआवजे को समायोजित किया जाएगा। UP News
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