शुरुआती छापेमारियों में जो सिरप बरामद हुआ, उसमें कोडीन की मात्रा असामान्य रूप से अधिक पाई गई। एक ऐसा घटक जिसे नशे के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। जांच एजेंसियों को यूपी में फैले कई सौ करोड़ रुपये के अवैध कारोबार का सुराग मिला।

UP News : मध्य प्रदेश में संदिग्ध कफ सिरप पीने के बाद बच्चों की मौत का मामला सामने आया, तो किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह जांच उत्तर प्रदेश तक फैले एक बड़े ड्रग नेटवर्क की परतें खोलेगी। शुरुआती छापेमारियों में जो सिरप बरामद हुआ, उसमें कोडीन की मात्रा असामान्य रूप से अधिक पाई गई। एक ऐसा घटक जिसे नशे के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। जैसे-जैसे पूछताछ आगे बढ़ी, जांच एजेंसियों को यूपी में फैले कई सौ करोड़ रुपये के अवैध कारोबार का सुराग मिला।
जांच ने तीन नामों शुभम जायसवाल, अमित सिंह टाटा, और आलोक सिंह पर खास फोकस किया। एजेंसियों का मानना है कि नशीले कफ सिरप की बांग्लादेश, नेपाल और देश के कई राज्यों में होने वाली सप्लाई इन्हीं की बनाई गई फर्जी कंपनियों के जरिये चल रही थी।
वाराणसी और गाजियाबाद में बनाए गए गोदाम इस तस्करी के प्रमुख ठिकाने थे, जहां से सिरप की खेप अलग-अलग राज्यों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भेजी जाती थी।
पूछताछ में सामने आया कि शुभम जायसवाल इस रैकेट का मुख्य संचालक था। उसने धनबाद और वाराणसी में बनावटी मेडिकल फर्में बनाई थीं, जिनके कागजों पर सिरप की खरीद-बिक्री दिखाकर असल में तस्करी चलाई जा रही थी। ट्रकों और कंटेनरों में कोडीन मिश्रित सिरप को नकली बिल और फर्जी ई-वे बिल के जरिए एक राज्य से दूसरे राज्य तक भेजा जाता था। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश इस कफ सिरप के सबसे बड़े बाजार बताए जाते हैं। नेटवर्क में शामिल लोगों को बताया जाता था कि कम जोखिम, ज्यादा मुनाफा, यही वजह थी कि कई नए लोग भी इसमें जुड़ते चले गए।
अमित टाटा के अनुसार, उसे बताया गया कि थोड़े निवेश में भारी कमाई संभव है। उसने लगभग 5 लाख रुपये लगाए और दावा है कि इस व्यवसाय से कई गुना ज्यादा कमाया भी। उसने स्वीकार किया कि शुभम का संपर्क दवा कंपनियों के अधिकारियों के साथ था और इनकी मदद से बड़े पैमाने पर फेंसिडिल सिरप खरीदा गया। चौंकाने वाली बात यह थी कि कंपनी ने उत्पादन रोकने के बावजूद शुभम की फर्मों को "सुपर स्टॉकिस्ट" का दर्जा दे रखा था, जो घोटाले के गहरे होने का प्रमाण माना जा रहा है।
ईडी और यूपी पुलिस की संयुक्त जांच में अब तक लगभग 50 से अधिक लोग संदिग्ध पाए गए हैं। इनमें शामिल हैं शुभम जायसवाल, अमित सिंह टाटा, बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह, विभोर राणा, विशाल सिंह, भोला जायसवाल, कई मेडिकल फर्मों के मालिक। कई जिलोंजैसे वाराणसी, जौनपुर, भदोही, गाजियाबाद, सोनभद्र, सुल्तानपुर में इनके खिलाफ मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। इसके अलावा खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन के कुछ अधिकारी भी जांच की जद में हैं, जिन्होंने इन फर्मों को लाइसेंस जारी किए थे।
जांच ने दो बड़े पूर्वांचली बाहुबलियों का नाम भी उछला है। आशंका है कि ये लोग शुभम को राजनीतिक और पुलिसिया संरक्षण दे रहे थे। ईडी को यह भी पता चला कि शुभम जायसवाल राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखते हुए खुद को एमएलसी के टिकट के लिए तैयार कर रहा था। वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट की एसआईटी इस पूरे नेटवर्क का गैंगचार्ट तैयार कर रही है। इसमें यह पता लगाया जा रहा है कि
किसका नेटवर्क किस जिले में था, किस फर्म से कितना सामान गया, पैसा किस रास्ते से घूमकर किन लोगों तक पहुंचता था। इन सबकी संपत्तियों को चिन्हित करके गैंगस्टर एक्ट में कार्रवाई की तैयारी भी चल रही है।
प्रवर्तन निदेशालय की शुरुआती आर्थिक जांच ने सभी को हैरान कर दिया। एजेंसी का दावा है कि यह नेटवर्क तीन राज्यों + दो देशों में लगभग 2000 करोड़ रुपये का अवैध कफ सिरप व्यापार कर चुका है। कई फर्जी कंपनियों के बैंक खातों में संदेहास्पद लेन-देन मिले हैं, जिनकी जांच अभी और गहरी की जा रही है। यह पूरा मामला तब खुला जब 2024 में लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी थाने में बड़ी मात्रा में कफ सिरप बरामद हुआ। यहीं से एसटीएफ को नेटवर्क की पहली मजबूत कड़ी मिली, जिसने पूरे गुट तक पहुंचने का रास्ता खोल दिया। 2000 करोड़ रुपये से बड़ा अवैध कारोबार सामने आया। राजनीतिक और बाहुबली कनेक्शन ने मामले को और गंभीर बना दिया।