वाराणसी का बेनियाबाग इलाका केवल एक मोहल्ला नहीं, बल्कि फुटबॉल की जीवित विरासत है। यहां की गलियों में खेल सिर्फ शौक नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा संस्कार है।

UP News : उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में है फुटबाल का मक्का। वाराणसी का बेनियाबाग इलाका केवल एक मोहल्ला नहीं, बल्कि फुटबॉल की जीवित विरासत है। यहां की गलियों में खेल सिर्फ शौक नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा संस्कार है। हालात ऐसे हैं कि इस क्षेत्र के लगभग हर घर में कोई न कोई खिलाड़ी जरूर मिलेगा, और कई परिवारों में तो तीन पीढ़ियां फुटबॉल से जुड़ी रही हैं।
दालमंडी क्षेत्र का एक परिवार इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां से जुड़वां भाइयों समेत 11 से अधिक राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉलर सामने आए। इन खिलाड़ियों ने न सिर्फ देश का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि फुटबॉल के बल पर कई राज्यों और केंद्र सरकार में नौकरियां भी हासिल कीं।
अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर और मौजूदा कोच शम्सी रजा बताते हैं कि उन्हें खेल की प्रेरणा अपने पिता रजा अली से मिली, जो खुद बेनिया मैदान के जाने-माने खिलाड़ी थे। शम्सी ने भारत के लिए प्री-ओलंपिक मुकाबले खेले और 1995 में पेशावर में पाकिस्तान के खिलाफ ऐतिहासिक गोल दागा। उस मैच में दर्शक नहीं थे, लेकिन मैदान में तैनात पुलिस और कमांडो के बीच भारतीय टीम ने 2-1 से जीत दर्ज की। उनके जुड़वां भाई शरियत रजा और फरहत रजा ने भी राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेला और आज सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं। परिवार के अन्य सदस्य शादाब रजा और मीशम रजा भी राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का हिस्सा रह चुके हैं।
दालमंडी निवासी अनीस हसन, जिन्होंने 1989 में सब-जूनियर नेशनल खेला था, अब अपने बेटे यासुब हसन के रूप में उसी परंपरा को आगे बढ़ते देख रहे हैं। यासुब फिलहाल मुंबई में पढ़ाई के साथ-साथ फुटबॉल खेल रहे हैं और वाराणसी से कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी नूर आलम के बेटे हसन आलम स्पेन के बी डिवीजन क्लब से खेलते हुए अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल कर रहे हैं।
बेनियाबाग की पहचान बनी लाल जर्सी का इतिहास भी खास है। गुलामी के दौर में एक अंग्रेज अधिकारी ने खिलाड़ियों को बिना टी-शर्ट खेलते देखा, तो पुलिस लाइन के लाल साफों से 30 शर्ट तैयार करवाई गईं। यही परंपरा आज भी जारी है और बेनिया के खिलाड़ी गर्व से लाल जर्सी पहनकर मैदान में उतरते हैं। इतनी प्रतिभा पैदा करने के बावजूद बेनियाबाग के खिलाड़ियों के दिल में एक कसक है, यहां अब तक एक बड़ा और आधुनिक फुटबॉल मैदान नहीं बन सका। खिलाड़ियों का कहना है कि यदि बेहतर सुविधाएं मिलें, तो बनारस देश को और भी बड़े फुटबॉल सितारे दे सकता है।