योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सभी सरकारी भर्तियों में आरक्षण नियमों का सख्ती से पालन करने का निर्देश जारी किया। इसका मकसद न केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देना था, बल्कि चुनावी साल में पिछड़े, दलित और अन्य आरक्षित वर्ग के असंतोष को कम करना भी था।

UP News : उत्तर प्रदेश में हाल ही में लेखपाल भर्ती में आरक्षण के नियमों के पालन को लेकर विवाद खड़ा हुआ। शिकायत थी कि ओबीसी वर्ग को उनके तय प्रतिशत से कम पद दिए गए, जबकि नियम के अनुसार उन्हें अधिक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए थी। यह मामला पंचायत चुनाव 2025 के पहले राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सभी सरकारी भर्तियों में आरक्षण नियमों का सख्ती से पालन करने का निर्देश जारी किया। इसका मकसद न केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देना था, बल्कि चुनावी साल में पिछड़े, दलित और अन्य आरक्षित वर्ग के असंतोष को कम करना भी था। मुख्य सचिव (नियुक्ति एवं कार्मिक) ने सभी विभागों और भर्ती एजेंसियों को निर्देश दिए कि वर्टिकल आरक्षण (एससी, एसटी, ओबीसी) और हॉरिजॉन्टल आरक्षण (महिला, दिव्यांग, पूर्व सैनिक आदि) का पूरा पालन सुनिश्चित किया जाए।
सरकारी नौकरियों में कुल 60% आरक्षण लागू है। लेखपाल भर्ती में ओबीसी को शुरू में केवल 18% पद दिए गए थे, जबकि नियम के मुताबिक उन्हें 27% पद मिलना चाहिए था। विरोध और समीक्षा के बाद ओबीसी के पद बढ़ाए गए और सामान्य वर्ग के पद घटाए गए।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे आरक्षित वर्ग विरोधी और अन्यायपूर्ण कदम बताया। जैसे ही यह सरकार के संज्ञान में आया इस पूरी तरह से सुधार लिया गया।
उनका आरोप था कि सरकार सामान्य वर्ग के वोटरों को खुश करने के लिए जानबूझकर नियमों की अनदेखी कर रही थी। सरकार ने इस विवाद के बाद स्पष्ट किया कि भविष्य में सभी भर्तियों में आरक्षण का पूर्ण और पारदर्शी पालन किया जाएगा। लेखपाल भर्ती विवाद ने यह दिखाया कि राजनीतिक दबाव और चुनावी संवेदनशीलता के समय में आरक्षण एक अहम मुद्दा बन जाता है। योगी सरकार ने इसे शांत करने और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कड़े कदम उठाए।