जिगर मुरादाबादी के 5 ऐसे शेर जो हर महफिल में तालियां लूट लें! मोहब्बत, गुरूर और दिल की गहराई एक ही जगह पढ़िए। जिगर मुरादाबादी के पिता अली नजर खुद कवि थे और ख्वाजा वज़ीर लखनवी के शिष्य, जबकि दादा फकीर मुहम्मद ‘गोया’ का भी अदब से नाता था।

Jigar Moradabadi : उत्तर प्रदेश की अदबी फिजा में जिस शायर की आवाज आज भी सबसे सुरीली गूंज की तरह सुनाई देती है, वह हैं जिगर मुरादाबादी (1890–1960) जिनका असली नाम शेख अली सिकंदर था। 6 अप्रैल 1890 को मुरादाबाद के उस परिवार में जन्मे, जहां शायरी रिवायत नहीं बल्कि विरासत थी। पिता अली नजर खुद कवि थे और ख्वाजा वज़ीर लखनवी के शिष्य, जबकि दादा फकीर मुहम्मद ‘गोया’ का भी अदब से नाता था। औपचारिक उच्च शिक्षा भले ही पूरी न हो सकी, पर फ़ारसी और अंग्रेजी की बुनियाद ने उनके लफ्जों को धार दी। शुरुआती दिनों में उन्होंने चश्मा बेचने तक का काम किया, लेकिन दिल का रास्ता उन्हें आखिरकार शायरी तक ही ले आया जहां पिता की शुरुआती तालीम और फिर दाग देहलवी व असगर गोंडावी जैसे उस्तादों की सलाह ने उनके फन को निखार दिया। “जिगर” (यानी जिगर/दिल की गहराई) का तखल्लुस अपनाकर और जन्मभूमि के सम्मान में “मुरादाबादी” जोड़कर वे उर्दू गजल के उस दौर के बड़े नाम बने, जब मुशायरों की महफिलें उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान थीं।
1 - हम को मिटा सके ये जमाने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

2 - दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं

3 - इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है

4 - क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है

5 - आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है Jigar Moradabadi
