फैसला सुनाते समय न्यायाधीश ने क्या कहा और महाभारत का उल्लेख करते हुए अपराध तथा दंड को लेकर कौन-सी अहम बात सामने रखी ? जानिए मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड, सौरभ राजपूत की हत्या और अदालत के फैसले से जुड़ी प्रमुख बातें।

UP News : उत्तर प्रदेश के मेरठ के बहुचर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में अदालत ने दोषी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत ने दोनों को सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में यह सजा सुनाई। सजा सुनाए जाने के दौरान दोनों दोषी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जेल से अदालत में पेश हुए, जबकि कोर्ट रूम में मृतक सौरभ की मां रेनू राजपूत और उनके भाई मौजूद रहे। इस मामले पर पूरे देश की नजरें टिकी थीं। अदालत में सजा सुनाए जाने के दौरान न्यायाधीश ने अपराध और दंड के संबंध में महाभारत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अपराधी को उसके अपराध के लिए दंड देना भी धर्म है। इसके बाद अदालत ने दोनों दोषियों को मृत्युदंड सुनाया। UP News
सजा सुनाए जाने के समय मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत से जुड़े थे। दोपहर करीब 4:15 बजे जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने दोनों को सजा सुनाई। कोर्ट रूम में सौरभ राजपूत की मां रेनू राजपूत और उनके भाई मौजूद रहे। हत्या और सबूत मिटाने के मामले में अलग-अलग सजा दी गई , अदालत ने हत्या से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोनों दोषियों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। वहीं, सबूत मिटाने से संबंधित धारा 238(ए) के तहत 20-20 हजार रुपये का जुर्माना और सात साल की सजा सूुनाई। आपको बता दें कि मेरठ का यह मामला मार्च 2025 में सामने आने के बाद देशभर में चर्चा का विषय बन गया था। अभियोजन के मुताबिक, सौरभ राजपूत की हत्या के बाद उनके शव के टुकड़े कर नीले ड्रम में भरकर सीमेंट से बंद कर दिया गया था। मामले में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराया गया था। UP News
वकील कृष्ण कुमार दुबे कहते हैं, "इस अपराध के लिए दोनों को मौत की सज़ा सुनाई गई है। उन्हें धारा 302 के तहत 50,000 रुपये और धारा 238A के तहत 20,000 रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया गया है। यह एक ऐतिहासिक फ़ैसला है। पूरा देश इसे देख रहा था; लोगों की नज़रें इस बात पर टिकी थीं कि इस अपराध को अंजाम देने वालों को क्या सज़ा मिलेगी। वे सदमे की हालत में लग रहे थे; वे हैरान थे। मौत की सज़ा का सामना कर रहे व्यक्ति की मानसिक स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। बचाव पक्ष ने दलीलें दी थीं—जैसे कि हत्या को किसी ने नहीं देखा और दोनों आरोपियों की बेटियाँ हैं—लेकिन इन सभी को खारिज कर दिया गया क्योंकि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूत इतने मज़बूत, अहम और सटीक थे कि उनसे उनका अपराध साबित हो गया। मुख्य आधार हत्या का तरीका था: उसने अपने पति की हत्या की—जिससे उसने प्यार करके शादी की थी—और फिर ठिकाने लगाने के लिए उसके शरीर को तीन हिस्सों में काट दिया और अवशेषों को एक नीले ड्रम में छिपा दिया। यह बहुत सोच-समझकर बनाई गई साज़िश और रणनीति थी। उसने शांत और स्थिर दिमाग से हत्या को अंजाम दिया। इसलिए, ऐसी पहले से सोची-समझी हत्या के लिए मौत की सज़ा ही सही सज़ा थी। देश के अदालती फ़ैसलों में यह एक अहम फ़ैसला है; किसी महिला को मौत की सज़ा मिलना अपने आप में एक मिसाल कायम करने वाली घटना है... जहाँ तक उसकी बेटी की बात है, वह छह साल तक अपनी माँ के साथ रह सकती है।"
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