पढ़ाई के मोर्चे पर उन्होंने फ़ारसी और उर्दू की औपचारिक शिक्षा बीच में छोड़ दी, लेकिन साहित्य और विचार की यात्रा कभी नहीं रुकी। आगे चलकर 1943 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और यही वैचारिक धारा उनकी शायरी में भी बार-बार झलकती रही।

Kaifi Azmi : सैयद अख्तर हुसैन रिज़वी यानी अदबी दुनिया के कैफ़ी आज़मी (14 जनवरी 1919–10 मई 2002) उर्दू शायरी का वो चमकता नाम हैं, जिसने 20वीं सदी की कविता को सिर्फ़ मोहब्बत और एहसास तक सीमित नहीं रहने दिया। कैफ़ी ने अपने कलाम में समाज की असल धड़कन उतारी जहां एक तरफ़ प्रेम की नरमी है, तो दूसरी तरफ़ इंसाफ़ की पुकार, बराबरी का सवाल और आम आदमी के दर्द की बेबाक सच्चाई भी। यही वजह है कि उन्हें उन चुनिंदा शायरों में गिना जाता है, जिनकी नज़्में आज भी पढ़ी नहीं जातीं बल्कि महसूस भी की जाती हैं।
कहानी का दिलचस्प मोड़ यह है कि कैफ़ी की प्रतिभा बहुत कम उम्र में सामने आ गई थी। 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल ‘इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े’ लिखी और जब इसे मशहूर गायिका बेगम अख्तर ने अपनी आवाज दी, तो यह ग़ज़ल लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर अमर हो गई। पढ़ाई के मोर्चे पर उन्होंने फ़ारसी और उर्दू की औपचारिक शिक्षा बीच में छोड़ दी, लेकिन साहित्य और विचार की यात्रा कभी नहीं रुकी। आगे चलकर 1943 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और यही वैचारिक धारा उनकी शायरी में भी बार-बार झलकती रही।
1- रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

2 - झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

3 - बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए

4 - तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

5 - रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ
