उत्तर प्रदेश के कानपुर में सामने आए चर्चित किडनी कांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। ताजा जांच में यह बात निकलकर आई है कि केशव नगर स्थित एक निजी अस्पताल में हुए कथित किडनी ट्रांसप्लांट में शामिल आठ सदस्यीय टीम में एक भी अधिकृत सर्जन मौजूद नहीं था।

UP News : उत्तर प्रदेश के कानपुर में सामने आए चर्चित किडनी कांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। ताजा जांच में यह बात निकलकर आई है कि केशव नगर स्थित एक निजी अस्पताल में हुए कथित किडनी ट्रांसप्लांट में शामिल आठ सदस्यीय टीम में एक भी अधिकृत सर्जन मौजूद नहीं था। जांच एजेंसियों के अनुसार, ऑपरेशन से जुड़े ज्यादातर लोग खुद को मेडिकल प्रोफेशनल बताकर गंभीर सर्जिकल प्रक्रियाओं को अंजाम दे रहे थे। इस पूरे मामले ने उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था, निजी अस्पतालों की निगरानी और अवैध मेडिकल नेटवर्क की संभावित पहुंच को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस के मुताबिक, जिस शख्स को अब तक “डॉक्टर अली” के नाम से पेश किया जा रहा था, वह असल में डॉक्टर नहीं, बल्कि एक ओटी मैनेजर निकला। उसकी पहचान मुदस्सर अली सिद्दीकी के रूप में हुई है, जो दिल्ली के उत्तम नगर क्षेत्र का रहने वाला बताया गया है।
इस मामले में गुरुवार को गिरफ्तार किए गए गाजियाबाद निवासी राजेश कुमार और कुलदीप सिंह राघव को अदालत में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया। इनमें एक ओटी मैनेजर और दूसरा ओटी असिस्टेंट बताया जा रहा है। पूछताछ में दोनों ने कई अहम जानकारियां दीं, जिनके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच और तेज हो गई है। डीसीपी एसएम कासिम आबिदी के मुताबिक, आरोपियों ने पूछताछ में स्वीकार किया कि किडनी निकालने और प्रत्यारोपित करने का काम कथित तौर पर अली ही करता था। इतना ही नहीं, अब तक जिन-जिन ऑपरेशनों का शक इस गिरोह पर है, उनमें भी अली की भूमिका सामने आ रही है। पुलिस का कहना है कि 28 मार्च की रात कानपुर में ऑपरेशन के बाद अली, राजेश और कुलदीप एक कार से गाजियाबाद रवाना हुए थे, जबकि टीम के अन्य सदस्य दूसरी गाड़ी से लखनऊ की ओर निकल गए।
कानपुर कांड की जांच कर रही उत्तर प्रदेश पुलिस की टीम ने शुक्रवार को दिल्ली के उत्तम नगर स्थित मुदस्सर अली के फ्लैट पर दबिश दी। हालांकि वह वहां नहीं मिला। बताया जा रहा है कि छापेमारी से पहले ही उसने अपना मोबाइल बंद कर लिया और फरार हो गया। पुलिस को उसकी पत्नी से जो जानकारी मिली, उसने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।
पत्नी ने पुलिस को बताया कि अली किसी डॉक्टर की तरह प्रैक्टिस नहीं करता था, बल्कि कुछ समय पहले तक दिल्ली के एक अस्पताल में ओटी मैनेजर के तौर पर काम कर चुका है। फिलहाल वह लंबे समय से नियमित नौकरी में भी नहीं था। इस खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश में इस अवैध मेडिकल नेटवर्क की पहुंच और गहराई को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि यह गिरोह ऑपरेशन से पहले एक नहीं, बल्कि दो संभावित डोनर बुलाता था। दोनों की मेडिकल जांच कराई जाती थी और रिपोर्ट आने के बाद जिस व्यक्ति की रिपोर्ट बेहतर मानी जाती, उसी की किडनी निकाली जाती थी। दूसरा व्यक्ति बैकअप यानी रिजर्व डोनर के रूप में रखा जाता था। यह तरीका न सिर्फ अनैतिक है, बल्कि कानून और मेडिकल प्रोटोकॉल की खुली अनदेखी भी माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में अंग प्रत्यारोपण से जुड़े नियमों के बीच इस तरह की गतिविधियां सामने आना बेहद चिंताजनक माना जा रहा है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क ने अब तक कितने लोगों को अपने जाल में फंसाया।
पूछताछ में जुड़े एक ओटी तकनीशियन ने यह भी बताया कि मार्च महीने में एक दक्षिण अफ्रीकी महिला का भी ऑपरेशन किया गया था। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी जांच के बाद ही हो पाएगी, लेकिन पुलिस को शक है कि इस गिरोह का नेटवर्क सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं था। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, उस कथित ऑपरेशन के बदले बड़ी रकम वसूली गई थी। कुछ सूत्रों के अनुसार यह रकम करोड़ों के करीब हो सकती है। अगर यह दावा सही साबित होता है, तो मामला केवल अवैध ट्रांसप्लांट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अंतरराज्यीय और संभवतः अंतरराष्ट्रीय मेडिकल रैकेट का रूप भी ले सकता है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की वित्तीय कड़ियों को भी खंगाल रही है। UP News