करवाचौथ के मौके पर उठा मम्माज बॉय और जोरू का गुलाम का सवाल। मां और पत्नी के बीच संतुलन, पुरुष की स्वतंत्रता और भारतीय परिवारों की सोच पर जानिए यह सामाजिक विश्लेषण।

UP News : नोएडा, ग्रेटर नोएडा अथवा उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे भारत में करवाचौथ के पर्व की धूम मची हुई है। चेतना मंच के संवाददाताओं ने पूरे उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में घूम-घूमकर करवाचौथ पर अनेक महिलाओं से बात की है। उत्तर प्रदेश की ज्यादातर महिलाएं करवाचौथ पर खुशी-खुशी करवाचौथ का व्रत रखने की तैयारियों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा करती हुई नजर आई। यह सवाल था कि - ‘‘आप माँ का लाड़ला बेटा हो या जोरू का गुलाम’’ उत्तर प्रदेश की ज्यादातर महिलाओं ने इस मुद्दे पर अपने-अपने ढंग से अपनी राय को सामने रखा। अभी-अभी पत्नी बनकर उत्तर प्रदेश की कुछ युवा महिलाओं ने इस विषय में ‘‘मम्माज बॉय’’ शब्द का भी प्रयोग किया। उत्तर प्रदेश की महिलाओं के द्वारा व्यक्त की गई राय के आधार पर चेतना मंच ने एक व्यापक विश्लेषण तैयार किया है। यह विश्लेषण नीचे प्रकाशित किया जा रहा है। इस विश्लेषण को पढक़र आपको समझ में आ जाएगा कि आप ममाज बॉय, माँ का लाड़ला बेटा हो अथवा जोरू का गुलाम। UP News
म्माज़ बॉय, मां का लाडला बेटा से ज़ोरू के ग़ुलाम भारतीय समाज में पुरुषों के लिए इस्तेमाल होने वाले ये कुछ ऐसे शब्द हैं, जो ऊपर से तो बड़े सामान्य या कभी-कभी मज़ाकिया लगते हैं, लेकिन इनके पीछे एक बहुत गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक जंग छिपी हुई है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने सदियों से पुरुष को ही सर्वोच्च मान्यता और विशेषाधिकार देकर स्त्रियों को हमेशा दोयम दर्जे पर रखा। स्त्रियों ने इस असमानता का जवाब देने के लिए और पुरुष के मानस पटल (माइंडसेट) पर कब्ज़े के लिए जो रणनीति अपनाई, उनके शीर्षक थे—'ममाज़ बॉय', 'मां का लाडला', 'राजा बेटा' या फिर 'जोरू का गुलाम'। यह कोई आम पारिवारिक नोक-झोंक नहीं, बल्कि पुरुष के तथाकथित 'मर्दानगी के अहंकार' (Male Ego) को सीधे तौर पर चोट पहुँचाने और उसे हमेशा स्त्री के अधीन दिखाने की एक सोची-समझी मनोवैज्ञानिक चाल है। UP News
जब एक पुरुष को 'मां का लाडला' या 'राजा बेटा' कहा जाता है, तो असल में स्त्री उसके आत्म सम्मान पर प्रहार कर रही होती है और वह यह कहना चाहती है कि जो तुम खुद को स्त्री का स्वामी और मालिक समझने का दंभ पाले हुए हो, वह तुम्हारा बहुत बड़ा भ्रम है। असल में तुम अंदर से निहायत खोखले और कमज़ोर हो। वह यह दर्शाती है कि अपनी पहचान और बुनियादी फैसलों के लिए खुद को शक्तिशाली समझने वाला मर्द आज भी एक स्त्री (मां) के पल्लू से बंधा हुआ है। यह पुरुष के उस अहंकार को पूरी तरह तोड़ देता है जहाँ वह खुद को सर्व समर्थ एवं संप्रभु समझता है।
खेल तब और दिलचस्प हो जाता है जब वही पुरुष शादी के बाद अपनी पत्नी की इच्छाओं या उसकी खुशियों को तवज्जो देने लगता है, तब वही स्त्री जो ममाज़ बॉय, मां का लाडला या राजा बेटा सुनकर परम प्रसन्नता हासिल करती थी तुरंत उस पर एक नया टैग जड़ देती है—'जोरू का गुलाम', और समाज रस ले लेकर इस शब्द की जुगाली करता है। यह टैग पुरुष के ईगो को सबसे ज्यादा ठेस पहुँचाता है। इसके ज़रिये स्त्रियाँ पुरुष को यह कड़वा अहसास कराती हैं कि वह चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, वह कभी भी एक स्वतंत्र संप्रभु मर्द नहीं बन सकता। यदि वह मां के प्रभाव से छूटेगा, तो तुरंत एक दूसरी स्त्री (पत्नी) के नियंत्रण में आ जाएगा। यह पुरुष को यह याद दिलाने की एक रणनीतिक चाल है कि उसका पूरा जीवन, उसका अस्तित्व और उसकी भावनाएँ हमेशा किसी न किसी स्त्री के ही इर्द-गिर्द घूमती रहेंगी और वह कभी भी स्त्री की इस मनोवैज्ञानिक अधीनता से मुक्त नहीं हो पाएगा। यह सब कुछ हमारी संस्कृति में इस तरह रच बस गया है कि किसी को इसका आभास तक नहीं होता कि यह कोई चाल या साज़िश है बल्कि लोग उसे पुरुष की ही मानसिक स्थिति समझते हैं।?
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