UP News: ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और शाही जामा मस्जिद मामलों में पक्षकार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मामलों का फैसला अदालतों द्वारा किया जाए।

UP News: उत्तर प्रदेश में तीन प्रमुख धार्मिक स्थल से जुड़े विवादों का अदालत के बाहर समाधान तलाशने की कोशिश नाकाम रही है। ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और शाही जामा मस्जिद मामलों में पक्षकार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मामलों का फैसला अदालतों द्वारा किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने 21, 22 और 23 अगस्त को आयोजित होने वाली विशेष लोक अदालत से पहले मध्यस्थता के माध्यम से लंबित मामलों के सौहार्दपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करने के लिए ‘देश भर में मध्यस्थता और विवादों के सामंजस्यपूर्ण समाधान के लिए उच्चतम न्यायालय का एक्शन’ (समाधान समारोह) शुरू किया है।
इस पहल के तहत, कई लंबित मामलों में शामिल पक्षों से आपसी सहमति से समझौता करने की संभावना तलाशने को कहा गया है।
ज्ञानवापी विवाद
पीटीआई के मुताबिक ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष के वकील मदन मोहन यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों से कहा था कि वे 14 जुलाई को वाराणसी कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में पेश हों और मामले का कोई समाधान खोजने की कोशिश करें। हालांकि, यादव ने कहा कि हिंदू पक्ष चाहता है कि इस विवाद का फैसला केवल कानूनी आधार पर हो। उन्होंने कहा, "हमने तय किया है कि मंदिर हमारा है और मुस्लिम पक्ष ने ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है। मस्जिद वाले पक्ष को यह जगह खाली कर देनी चाहिए ताकि मूल ज्योतिर्लिंग वाली जगह पर एक भव्य काशी विश्वनाथ मंदिर बनाया जा सके।"
अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी के सेक्रेटरी मोहम्मद यासीन ने कहा कि देश भर में ऐसे हज़ारों मामले लंबित हैं और उन्हें शक है कि बातचीत या मध्यस्थता से कोई समाधान निकल पाएगा। उन्होंने कहा कि कमेटी अभी भी इस बात पर विचार कर रही है कि मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल हुआ जाए या नहीं।
वाराणसी में ज्ञानवापी का मामला सिविल कोर्ट में चल रहा एक केस है। इसमें काशी विश्वनाथ मंदिर के पास स्थित ज्ञानवापी मस्जिद के धार्मिक दर्जे को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।
हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मस्जिद 17वीं सदी में मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा प्राचीन मंदिर के कुछ हिस्सों को तोड़े जाने के बाद बनाई गई थी।
वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह मस्जिद औरंगजेब के शासनकाल से पहले की है और यह एक वैध वक्फ संपत्ति है।
संभल की शाही मस्जिद का विवाद
संभल की शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद में, मस्जिद कमेटी के वकील शकील अहमद वारसी ने कहा कि यह मामला धार्मिक आस्थाओं से जुड़ा है और इतना संवेदनशील है कि इसे आपसी समझौते से हल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कहा, "यह हिंदुओं, मुसलमानों और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा एक संवेदनशील मामला है। यह मंदिर है या मस्जिद, इसका फैसला अदालत को करना चाहिए, न कि आपसी समझौते से।"
हिंदू पक्ष के वकील गोपाल शर्मा ने कहा कि उन्हें संभल मामले में बातचीत या मध्यस्थता के किसी प्रस्ताव के बारे में जानकारी नहीं है।
संभल का विवाद वाराणसी के मामले जैसा ही है, जहाँ उस जगह के धार्मिक स्वरूप को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। हिंदू याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 16वीं सदी की जामा मस्जिद एक प्राचीन हरि-हर मंदिर की जगह पर बनाई गई थी, लेकिन मुस्लिम पक्ष ने इस दावे को गलत बताया है।
श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद
हिंदू पक्ष के वकील हरेराम त्रिपाठी ने बताया कि श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद में, इस महीने की शुरुआत में मथुरा में ज़िला कानूनी सेवा प्राधिकरण के सामने मध्यस्थता की कार्यवाही हुई थी, लेकिन मुस्लिम पक्ष का कोई भी प्रतिनिधि बैठक में शामिल नहीं हुआ, जिससे यह प्रक्रिया विफल रही। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को सुलह-समझौते की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए दो बार बुलाया गया था, लेकिन मुस्लिम पक्ष नहीं आया, जिसके बाद मध्यस्थता की कार्यवाही बंद कर दी गई। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पक्ष ने बताया कि वह मध्यस्थता के ज़रिए विवाद सुलझाने को तैयार नहीं है और नियमित अदालती कार्यवाही के ज़रिए फैसला चाहता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में आगे की कार्यवाही के लिए 17 जुलाई की तारीख तय की है, जबकि सुप्रीम कोर्ट अगस्त में होने वाली स्पेशल लोक अदालत में मध्यस्थता पहल के तहत इस पर विचार कर सकता है।
हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ता महेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदू पक्ष कोर्ट के सामने अपनी बात पर कायम है कि विवादित जगह भगवान कृष्ण का जन्मस्थान है और वे कानूनी प्रक्रिया के ज़रिए इस मामले को आगे बढ़ाएंगे।
मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद तब शुरू हुआ जब हिंदू पक्ष ने एक याचिका दायर कर आरोप लगाया कि मस्जिद 17वीं सदी में ठीक उसी जगह पर बनाई गई थी जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था।
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