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शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल अब सवालों के घेरे में हैं। आरोप है कि कई नामी निजी स्कूल एनसीईआरटी के नाम पर महंगी प्राइवेट किताबें थोपकर अभिभावकों से खुली वसूली कर रहे हैं।

UP News : शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल अब सवालों के घेरे में हैं। आरोप है कि कई नामी निजी स्कूल एनसीईआरटी के नाम पर महंगी प्राइवेट किताबें थोपकर अभिभावकों से खुली वसूली कर रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर बताई जा रही है कि कुछ मामलों में पतली सी म्यूजिक की किताब तक 300-400 रुपये में बेची जा रही है, जबकि एनसीईआरटी की किताबें अपेक्षाकृत सस्ती होती हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कई स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स के साथ गठजोड़ कर लेते हैं।
* स्कूल तय करते हैं कि कौन-सी किताब खरीदनी है
* वही किताबें स्कूल से जुड़े स्टोर्स पर उपलब्ध होती हैं
* अभिभावकों के पास विकल्प लगभग खत्म हो जाता है।
इस पूरे सिस्टम में कमीशन और मुनाफे का खेल चलता है, जिसका सीधा बोझ माता-पिता पर पड़ता है।
एनसीईआरटी की किताबें देशभर में सबसे किफायती मानी जाती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि:
* प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें कई गुना महंगी होती हैं
* कुछ मामलों में पूरा सेट 8,000 तक पहुंच जाता है
* जबकि एनसीईआरटी किताबें कम कीमत पर उपलब्ध रहती हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए यूपी बोर्ड ने सख्त कदम उठाए हैं:
* सिर्फ अधिकृत किताबें ही पढ़ाई जाएंगी
* अनधिकृत किताबें थोपने पर कार्रवाई होगी
* अभिभावकों को कमीशनखोरी से बचाने की कोशिश।
इसके अलावा, प्रशासन ने स्कूलों में निरीक्षण अभियान भी शुरू किया है ताकि महंगी और गैर-मान्यता प्राप्त किताबों की बिक्री रोकी जा सके।
यह समस्या किसी एक शहर तक सीमित नहीं है।
* दिल्ली हाईकोर्ट में भी महंगी किताबों को लेकर सवाल उठ चुके हैं
* कई जगह नकली और महंगी किताबों के रैकेट भी पकड़े गए हैं ।
यानी शिक्षा अब कई जगह कमाई का जरिया बनती जा रही है। इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या बुक बिजनेस चला रहे हैं?। जब एक साधारण किताब के लिए भी अभिभावकों को ज्यादा पैसे चुकाने पड़ें, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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