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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने न केवल 15 परिवारों को गहरे शोक में डुबो दिया है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और निर्माण नियमों के पालन पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने न केवल 15 परिवारों को गहरे शोक में डुबो दिया है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और निर्माण नियमों के पालन पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद सामने आए दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि जिस इमारत में आग लगने से कई युवाओं की दर्दनाक मौत हुई, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के आधार पर ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया था। हैरानी की बात यह है कि यह आदेश दो महीने के भीतर ही वापस ले लिया गया। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि अवैध घोषित भवन को बचा लिया गया और क्या समय रहते कार्रवाई होती तो इतनी बड़ी त्रासदी टाली जा सकती थी? UP News
अलीगंज योजना के सेक्टर-डी में स्थित एमएस-102-डी नंबर का यह भवन मूल रूप से वर्ष 1980 में आवंटित किया गया था। लॉटरी प्रणाली के तहत यह संपत्ति विजय कुमार को रेंट-परचेज योजना के अंतर्गत मिली थी। उसी वर्ष औपचारिक समझौते के बाद उन्हें भवन का कब्जा भी सौंप दिया गया। समय के साथ इस संपत्ति का स्वामित्व बदला। वर्ष 2005 में विक्रय विलेख के माध्यम से भवन विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ। इसके बाद जनवरी 2013 में यह संपत्ति वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दी गई। अगले वर्ष लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने नामांतरण की प्रक्रिया पूरी करते हुए भवन को उनके नाम दर्ज कर दिया। करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले इस भवन का नक्शा वर्ष 2014 में आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था। लेकिन बाद के वर्षों में भवन में बड़े पैमाने पर अनधिकृत निर्माण होने की शिकायतें सामने आने लगीं। जांच के दौरान एलडीए को भी निर्माण नियमों के उल्लंघन के संकेत मिले, जिसके बाद भवन मालिकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई। UP News
अनधिकृत निर्माण के आरोपों की जांच के बाद एलडीए ने वर्ष 2016 में भवन के खिलाफ मामला दर्ज किया। जांच पूरी होने पर 10 मई 2016 को भवन के अवैध हिस्सों को गिराने का आदेश जारी कर दिया गया। यह आदेश स्पष्ट संकेत था कि निर्माण निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं था। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि ध्वस्तीकरण का आदेश जारी होने के बावजूद उस पर अमल क्यों नहीं हुआ। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि महज दो महीने के भीतर, 5 जुलाई 2016 को यह आदेश निरस्त कर दिया गया। UP News
सूत्रों के अनुसार, निर्माण कार्य के दौरान प्राधिकरण की ओर से कई बार नोटिस जारी किए गए थे। बावजूद इसके न तो निर्माण को रोका गया और न ही नियमों के उल्लंघन पर कोई कठोर कदम उठाया गया। समय के साथ भवन में व्यावसायिक गतिविधियां भी शुरू हो गईं और यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा। बताया जा रहा है कि इस अवधि में कई शिकायतें दर्ज हुईं, फाइलें चलीं, जांच के आदेश भी हुए, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। नतीजतन, विवादित निर्माण वर्षों तक जस का तस खड़ा रहा। UP News
अग्निकांड के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब भवन को लेकर पहले से अनियमितताओं की जानकारी थी, तो जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि वर्ष 2014 से 2026 के बीच इस क्षेत्र में करीब 30 अधिकारी, इंजीनियर, जोनल अधिकारी और संबंधित प्राधिकरण के पदाधिकारी तैनात रहे। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि किन अधिकारियों के कार्यकाल में नियमों की अनदेखी हुई और किन स्तरों पर फैसलों को प्रभावित किया गया। यदि जांच में लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई की तलवार लटक सकती है। UP News
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