लखनऊ में बांग्लादेशी नागरिक मोहम्मद सज्जाद हुसैन की गिरफ्तारी के बाद फर्जी आधार, पैन, वोटर आईडी, निवास और जन्म प्रमाण पत्र को लेकर बड़े सवाल खड़े हुए हैं। PUBG से शुरू हुई प्रेम कहानी और दस्तावेजी फर्जीवाड़े की पूरी कहानी।

लखनऊ। ऑनलाइन गेम PUBG से शुरू हुई एक प्रेम कहानी ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भारतीय पहचान और दस्तावेज व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बांग्लादेश के चटगांव निवासी मोहम्मद सज्जाद हुसैन को बाजारखाला पुलिस ने कथित तौर पर फर्जी भारतीय दस्तावेजों के सहारे लखनऊ में रहने के आरोप में गिरफ्तार किया है। उसके साथ जनसेवा केंद्र संचालक मोहम्मद तलहा को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस जांच के मुताबिक सज्जाद के पास बांग्लादेश के दो पासपोर्ट के साथ भारतीय आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी सहित कई दस्तावेज मिले। जांच में उसके नाम से लखनऊ का निवास और जन्म प्रमाण पत्र भी सामने आया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि उसके नाम का निवास प्रमाण पत्र 10 अगस्त 2023 का है, जबकि पुलिस के अनुसार वह पहली बार 18 अगस्त 2023 को भारत आया था। यानी दस्तावेज की तारीख उसके भारत आने से पहले की है।
पुलिस पूछताछ में सामने आई कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2018 में बांग्लादेश के सज्जाद की पहचान लखनऊ की फरहीन नाज से ऑनलाइन गेम PUBG खेलने के दौरान हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और कथित तौर पर दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गया। इसके बाद सज्जाद ने भारत आकर फरहीन से मिलने का फैसला किया।
पुलिस के मुताबिक सज्जाद 18 अगस्त 2023 को बांग्लादेशी पासपोर्ट पर टूरिस्ट वीजा लेकर सऊदी अरब के रास्ते लखनऊ पहुंचा। इसके कुछ ही दिनों बाद 28 अगस्त 2023 को सज्जाद और फरहीन ने फैजाबाद यानी अयोध्या में कोर्ट मैरिज कर ली। शादी के बाद सज्जाद लखनऊ में ही रहने लगा। बाजारखाला क्षेत्र के भदेवा स्थित नसीरुल्ला अपार्टमेंट में वह अपनी पत्नी के साथ रह रहा था।
पुलिस की जांच के अनुसार भारत में लंबे समय तक रहने और बैंक खाता आदि सुविधाएं हासिल करने के लिए सज्जाद को भारतीय पहचान संबंधी दस्तावेजों की जरूरत पड़ी। यहीं से कथित तौर पर मोहम्मद तलहा की भूमिका सामने आती है, जो जनसेवा केंद्र चलाता था। पुलिस का दावा है कि तलहा ने पहले सज्जाद के लिए फर्जी निवास और जन्म प्रमाण पत्र तैयार किए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर आधार कार्ड बनवाया गया और फिर आधार के जरिए पैन कार्ड तथा वोटर आईडी भी तैयार कराई गई। इन दस्तावेजों के आधार पर लखनऊ में बैंक खाता भी खुलवाए जाने की बात जांच में सामने आई है।
जांच में एक और हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है। पुलिस के मुताबिक सज्जाद ने दस्तावेज बनवाने के लिए तलहा की मां के खाते में ऑनलाइन 900 रुपये भेजे और 2,000 रुपये नकद दिए। यानी कथित तौर पर कुल 2,900 रुपये में एक विदेशी नागरिक के लिए भारतीय पहचान से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार कर दिए गए। पुलिस ने तलहा के पास से कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तथा कथित फर्जी दस्तावेजों की प्रतियां भी बरामद की हैं।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में मतदाता सूची और मतदाता पहचान से जुड़े दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर SIR यानी Special Intensive Revision जैसी प्रक्रिया चर्चा में है। एक तरफ वास्तविक भारतीय नागरिकों को अपना नाम, पता, पहचान और अन्य दस्तावेज साबित करने के लिए तरह-तरह के प्रमाण जुटाने पड़ते हैं। कई लोग अपने दस्तावेजों में छोटी-सी त्रुटि ठीक कराने के लिए सरकारी कार्यालयों और सेवा केंद्रों के चक्कर लगाते हैं। दूसरी तरफ यदि पुलिस जांच में सामने आई बातें सही साबित होती हैं तो सवाल यह है कि एक विदेशी नागरिक के नाम पर निवास प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, आधार, पैन और वोटर आईडी जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज आखिर किस प्रक्रिया से जारी हो गए? यह सवाल सिर्फ लखनऊ का नहीं है। यह पूरे दस्तावेजी और पहचान सत्यापन तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक जन्म प्रमाण पत्र को लेकर है। किसी विदेशी नागरिक के नाम पर भारतीय पते से कथित जन्म प्रमाण पत्र तैयार होना सामान्य दस्तावेजी गलती का विषय नहीं माना जा सकता। यदि पुलिस की जांच में यह प्रमाणित होता है कि दस्तावेज जानबूझकर कूटरचित तरीके से बनाए गए थे तो यह पता लगाना बेहद जरूरी होगा कि—
पुलिस के अनुसार सज्जाद के नाम पर जो निवास प्रमाण पत्र मिला, उस पर 10 अगस्त 2023 की तारीख दर्ज है, जबकि उपलब्ध जांच के मुताबिक उसका भारत में प्रवेश 18 अगस्त 2023 को हुआ था। अगर जांच में यह तथ्य और दस्तावेज दोनों प्रमाणित होते हैं तो यह अपने आप में एक बड़ा सवाल होगा कि भारत में प्रवेश करने से पहले ही लखनऊ के पते का कथित निवास प्रमाण पत्र कैसे तैयार हो गया। यही बिंदु पूरे मामले की गहराई से जांच की जरूरत को सामने लाता है।
पुलिस के अनुसार सज्जाद का टूरिस्ट वीजा 23 सितंबर 2026 को समाप्त हो गया था। इसके बावजूद वह लखनऊ में रह रहा था। FRRO से जुड़ी सूचना के बाद पुलिस की कार्रवाई में उसका पता चला। पूछताछ के दौरान उसके पास भारतीय पहचान संबंधी दस्तावेज मिलने के बाद मामला और गंभीर हो गया। पुलिस ने उसके पास से दो बांग्लादेशी पासपोर्ट मिलने की भी बात कही है। दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, विदेशी अधिनियम और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की संबंधित धाराओं में कार्रवाई की गई है।
सज्जाद और तलहा की गिरफ्तारी के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि एक विदेशी नागरिक ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज कैसे बनवाए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन दस्तावेजों को बनाने और उन्हें सरकारी पहचान व्यवस्था तक पहुंचाने में कितने स्तरों पर चूक हुई? अगर कोई विदेशी नागरिक कुछ हजार रुपये खर्च करके कथित तौर पर— निवास प्रमाण पत्र → जन्म प्रमाण पत्र → आधार कार्ड → पैन कार्ड → वोटर आईडी → बैंक खाता की पूरी श्रृंखला तैयार कर सकता है, तो यह देश की पहचान व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर चेतावनी है।
पुलिस ने बांग्लादेशी नागरिक और जनसेवा केंद्र संचालक को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन इस मामले की असली तह तक पहुंचने के लिए यह पता लगाना जरूरी है कि दस्तावेज जारी कराने की प्रक्रिया में और कौन-कौन लोग शामिल थे। यदि दस्तावेज वास्तव में फर्जी पाए जाते हैं तो उनके डिजिटल रिकॉर्ड, आवेदन प्रक्रिया, सत्यापन लॉग और संबंधित एजेंसियों के रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि क्या इसी नेटवर्क ने इससे पहले किसी अन्य विदेशी नागरिक अथवा ऐसे व्यक्ति के लिए इसी तरह के दस्तावेज तैयार किए हैं।
और सबसे बड़ा सवाल—
सज्जाद की गिरफ्तारी का मामला अब केवल एक प्रेम कहानी, एक कोर्ट मैरिज या एक बांग्लादेशी नागरिक के अवैध प्रवास का मामला नहीं रह गया है। यह भारतीय पहचान व्यवस्था, दस्तावेज सत्यापन और मतदाता सूची की विश्वसनीयता की बड़ी परीक्षा बन गया है। पुलिस जांच में सामने आए आरोप अदालत में प्रमाणित होना अभी बाकी हैं। लेकिन इस प्रकरण ने जिस सवाल को जन्म दिया है, उसका जवाब दस्तावेज बनाने वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी से आगे जाकर पूरे सिस्टम की जांच से ही मिलेगा।
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