इश्क़ से इंक़लाब तक: हसरत मोहानी के 5 यादगार शेर
वे सिर्फ़ एक प्रसिद्ध उर्दू शायर नहीं, बल्कि ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता थे जिनके विचार अपने समय से आगे थे। 1921 में “इंक़लाब ज़िंदाबाद” जैसा दमदार नारा पहली बार उनके लिखे हुए शब्दों के रूप में सामने आया।

Hasrat Mohani : सैयद फ़ज़ल-उल-हसन, जिन्हें उर्दू दुनिया हसरत मोहानी के नाम से जानती है (1 जनवरी 1875–13 मई 1951), भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की उन बेबाक आवाज़ों में थे, जिन्होंने कलम और कर्म दोनों से लड़ाई लड़ी। वे सिर्फ़ एक प्रसिद्ध उर्दू शायर नहीं, बल्कि ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता थे जिनके विचार अपने समय से आगे थे। 1921 में “इंक़लाब ज़िंदाबाद” जैसा दमदार नारा पहली बार उनके लिखे हुए शब्दों के रूप में सामने आया। यही नारा आगे चलकर आज़ादी की लड़ाई की पहचान बना और भगत सिंह, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे क्रांतिकारियों के साथ जन-जन की जुबान पर चढ़ गया। उसी दौर में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग उठाने वालों में उनका नाम सबसे पहले लिया जाता है।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
हसरत मोहानी का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के मोहान कस्बे में हुआ। उनके पिता का नाम सैयद अज़हर हुसैन बताया जाता है। शुरुआती पढ़ाई उन्होंने घर पर ही की और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से 1903 में बी.ए. पूरा किया। छात्र जीवन से ही उन्हें शायरी का शौक था और वे अपना कलाम उस समय के साहित्यिक दायरे में दिखाने-सुनाने लगे।
पत्रकारिता से राजनीति तक
1903 में उन्होंने अलीगढ़ से पत्रिका ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ निकाली। यह पत्रिका अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों पर तीखी टिप्पणी के लिए जानी गई। 1904 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और जल्द ही राष्ट्रीय आंदोलन के सक्रिय चेहरों में शामिल हो गए। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में भी उन्होंने भागीदारी की। उनकी लिखाई का असर इतना तीखा था कि 1907 में पत्रिका में प्रकाशित एक लेख जिसमें ब्रिटिश नीति की आलोचना थी के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
हसरत मोहानी के टॉप 5 शेर
1 - वफ़ा तुझ से ऐ बेवफ़ा चाहता हूँ,
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ। 
2 - और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है,
इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है। 
3 -मिलते हैं इस अदा से कि गोया ख़फ़ा नहीं,
क्या आप की निगाह से हम आश्ना नहीं। 
4 - कभी की थी जो अब वफ़ा कीजिएगा,
मुझे पूछ कर आप क्या कीजिएगा। 
5 - शिकवा-ए-ग़म तिरे हुज़ूर किया,
हम ने बे-शक बड़ा क़ुसूर किया। 
Hasrat Mohani : सैयद फ़ज़ल-उल-हसन, जिन्हें उर्दू दुनिया हसरत मोहानी के नाम से जानती है (1 जनवरी 1875–13 मई 1951), भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की उन बेबाक आवाज़ों में थे, जिन्होंने कलम और कर्म दोनों से लड़ाई लड़ी। वे सिर्फ़ एक प्रसिद्ध उर्दू शायर नहीं, बल्कि ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता थे जिनके विचार अपने समय से आगे थे। 1921 में “इंक़लाब ज़िंदाबाद” जैसा दमदार नारा पहली बार उनके लिखे हुए शब्दों के रूप में सामने आया। यही नारा आगे चलकर आज़ादी की लड़ाई की पहचान बना और भगत सिंह, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे क्रांतिकारियों के साथ जन-जन की जुबान पर चढ़ गया। उसी दौर में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग उठाने वालों में उनका नाम सबसे पहले लिया जाता है।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
हसरत मोहानी का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के मोहान कस्बे में हुआ। उनके पिता का नाम सैयद अज़हर हुसैन बताया जाता है। शुरुआती पढ़ाई उन्होंने घर पर ही की और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से 1903 में बी.ए. पूरा किया। छात्र जीवन से ही उन्हें शायरी का शौक था और वे अपना कलाम उस समय के साहित्यिक दायरे में दिखाने-सुनाने लगे।
पत्रकारिता से राजनीति तक
1903 में उन्होंने अलीगढ़ से पत्रिका ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ निकाली। यह पत्रिका अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों पर तीखी टिप्पणी के लिए जानी गई। 1904 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और जल्द ही राष्ट्रीय आंदोलन के सक्रिय चेहरों में शामिल हो गए। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में भी उन्होंने भागीदारी की। उनकी लिखाई का असर इतना तीखा था कि 1907 में पत्रिका में प्रकाशित एक लेख जिसमें ब्रिटिश नीति की आलोचना थी के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
हसरत मोहानी के टॉप 5 शेर
1 - वफ़ा तुझ से ऐ बेवफ़ा चाहता हूँ,
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ। 
2 - और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है,
इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है। 
3 -मिलते हैं इस अदा से कि गोया ख़फ़ा नहीं,
क्या आप की निगाह से हम आश्ना नहीं। 
4 - कभी की थी जो अब वफ़ा कीजिएगा,
मुझे पूछ कर आप क्या कीजिएगा। 
5 - शिकवा-ए-ग़म तिरे हुज़ूर किया,
हम ने बे-शक बड़ा क़ुसूर किया। 












