2013 में उसने ब्रिटिश नागरिकता भी हासिल कर ली। इसके बावजूद 2007 से 2017 तक उसके नाम पर नियमित वेतन व इंक्रीमेंट जारी रहे।

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में एक ऐसा घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक प्रणाली की कमजोरियों और भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर कर दिया है। यहां एक मदरसा शिक्षक शमशुल पिछले 11 साल से लंदन में रह रहा था, लेकिन कागजों में उसकी नियमित उपस्थिति, सैलरी और हर साल का इंक्रीमेंट जारी था। इतना ही नहीं, उसने लंदन से ही वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) के लिए आवेदन किया और आजमगढ़ प्रशासन ने इसे मंजूर करते हुए पेंशन भी स्वीकृत कर दी।
कुछ समय पहले यूपी एटीएस को संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े इनपुट मिले। जांच शुरू हुई तो मामला परत-दर-परत खुलता चला गया। जांच में सामने आया कि शमशुल की नियुक्ति 1984 में सहायक अध्यापक (आलिया) पद पर हुई थी। वर्ष 2007 में वह आन-ड्यूटी ब्रिटेन चला गया और वहीं बस गया। 2013 में उसने ब्रिटिश नागरिकता भी हासिल कर ली। इसके बावजूद 2007 से 2017 तक उसके नाम पर नियमित वेतन व इंक्रीमेंट जारी रहे। जांच अधिकारियों के अनुसार, शमशुल इस अवधि में सरकारी वेतन और बाद में मंजूर पेंशन का पैसा विभिन्न देशों में यात्रा और धार्मिक प्रचार-प्रसार पर खर्च करता रहा।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि मदरसा कमेटी की ओर भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने एक दशक तक बिना किसी औपचारिक सत्यापन के शिक्षक को इंक्रीमेंट दिए। न तो उसकी उपस्थिति की जांच हुई, न उसके भारत में होने का सत्यापन, न ही विभाग ने कभी इस बात पर सवाल उठाया कि एक कर्मचारी विदेश में बस कर भी कैसे ड्यूटी पर मौजूद दिखाया जा रहा है।
2017 में जब शमशुल ने लंदन से वीआरएस का आवेदन भेजा, तो स्थानीय अधिकारियों ने उसके अच्छे आचरण का हवाला दिया,
और वीआरएस मंजूर कर दिया, और 1 अगस्त 2017 से पेंशन भुगतान भी स्वीकृत कर दिया। एटीएस के अनुसार, यह सब कई स्तरों पर विभागीय मिलीभगत के बिना संभव ही नहीं था।
मामले के खुलासे के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। तीन अधिकारी लालमन, प्रभात कुमार तथा साहित्य निकत सिंह निशाने पर हैं। जिन्होंने अलग-अलग समय पर जिले में अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के रूप में कार्य किया था, उनके खिलाफ रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। ये तीनों वर्तमान में बरेली, अमेठी, गाजिÞयाबाद में इसी पद पर तैनात हैं। जांच अब इस दिशा में भी बढ़ रही है कि उनके कार्यकाल में यह फजीर्वाड़ा कैसे चलता रहा और किसने इसके लिए मंजूरी दी। एटीएस की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि फर्जी वीआरएस फाइल को मंजूरी देने और जीपीएफ भुगतान कराने में निदेशालय स्तर पर बैठे कई अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। इसी तरह मदरसा कमेटी और प्रधानाचार्य की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। जल्द ही इन सब पर विभागीय कार्यवाही, निलंबन या एफआईआर जैसी कार्रवाई संभव है।