विज्ञापन
देश में जब भी किसान आंदोलनों की चर्चा होगी तो बाबा महेंद्र सिंह टिकैत का नाम सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिना जाएगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव से निकलकर उन्होंने खेत-खलिहान की आवाज को सीधे दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने का काम किया।

UP News : देश में जब भी किसान आंदोलनों की चर्चा होगी तो बाबा महेंद्र सिंह टिकैत का नाम सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिना जाएगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव से निकलकर उन्होंने खेत-खलिहान की आवाज को सीधे दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने का काम किया। बाबा महेंद्र टिकैत केवल किसान नेता भर नहीं थे, बल्कि वे उस ग्रामीण भारत की बुलंद आवाज थे जिसे लंबे समय तक देश की सत्ता द्वारा नजरअंदाज किया जाता रहा। उनके एक आह्वान पर लाखों किसान ट्रैक्टरों और बैलगाड़ियों के साथ सड़कों पर उतर आते थे और सरकारों को अपनी नीतियों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता था। बाबा टिकैत ने किसानों को सिर्फ आंदोलन करना नहीं सिखाया बल्कि उन्हें अपनी ताकत और हक की पहचान भी कराई। आज बाबा टिकैत की 15 वीं पुण्यतिथि है। इस लेख के माध्यम से हम आपको उनके जीवन से जुड़े कई प्रसिद्ध किस्सों के बारे में बताएंगे। UP News
6 अक्टूबर 1935 को जन्मे बाबा टिकैत के जीवन में नेतृत्व की जिम्मेदारी बहुत कम उम्र में ही आ गई थी । पिता चौधरी चौहल सिंह के निधन के बाद मात्र आठ वर्ष की आयु में उन्हें बालियान खाप की जिम्मेदारी सौंप दी गई। जिस उम्र में बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में टिकैत समाज की अगुवाई कर रहे थे। समय बीतने के साथ वही बालक आगे चलकर किसानों का सबसे बड़ा चेहरा बना, जिसकी एक आवाज पर लाखों किसान सड़कों पर उतर आते थे। उस दौर में किसानों की समस्याएं सत्ता के गलियारों तक पहुंच ही नहीं पाती थीं। गन्ने का कम दाम, बिजली संकट, सिंचाई की परेशानी और सरकारी उपेक्षा ने गांवों में असंतोष बढ़ा दिया था। बाबा टिकैत ने इन्हीं मुद्दों को आंदोलन का आधार बनाया और किसानों को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने किसानों को यह भरोसा दिलाया कि अगर वे एकजुट हो जाएं तो सरकारों को भी फैसले बदलने पड़ सकते हैं। UP News
साल 1988 में मेरठ कमिश्नरी में किसानों की 35 सूत्रीय मांगों को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। हजारों किसानों ने कमिश्नरी परिसर में डेरा डाल दिया। कड़ाके की सर्दी में खुले आसमान के नीचे 24 दिन तक आंदोलन चलता रहा। कई किसानों की ठंड से मौत भी हुई, लेकिन आंदोलनकारी पीछे नहीं हटे। हालांकि सरकार की ओर से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, लेकिन इसी आंदोलन ने बाबा टिकैत को यह एहसास कराया कि अब लड़ाई गांव या जिले की नहीं, बल्कि सीधे लखनऊ और दिल्ली की सत्ता से होगी। मेरठ आंदोलन के बाद बाबा टिकैत ने किसानों के साथ रेल रोको और रास्ता रोको अभियान शुरू किया। कई जगहों पर पुलिस कार्रवाई भी हुई, लेकिन किसानों का मनोबल नहीं टूटा। छह मार्च 1988 को रजबपुरा में शुरू हुआ धरना 110 दिनों तक चला। सरकार की चुप्पी के बाद टिकैत ने देशभर के किसान संगठनों को एक मंच पर लाने का फैसला किया। यही रणनीति आगे चलकर देश के सबसे बड़े किसान आंदोलनों में बदल गई। इसके बाद 25 अक्टूबर 1988 को दिल्ली के वोट क्लब पर लाखों किसानों का जनसैलाब उमड़ा। विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक किसान ही किसान नजर आ रहे थे। इसी दौरान मंच से बाबा टिकैत की आवाज गूंजी “खबरदार इंडिया वालो, दिल्ली में भारत आ गया है। यह सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि सत्ता को दी गई खुली चेतावनी थी कि गांव और किसान अब अपनी ताकत दिखाने राजधानी पहुंच चुके हैं। एक हाथ में हुक्का और दूसरे हाथ में माइक लिए बाबा टिकैत उस दिन किसानों के सबसे बड़े प्रतीक बन गए थे। सात दिन तक चले इस ऐतिहासिक आंदोलन में 14 राज्यों के किसान शामिल हुए। अंततः तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को किसानों की मांगों पर झुकना पड़ा। UP News
इससे पहले पश्चिमी यूपी में बिजली संकट और गन्ने के भुगतान को लेकर किसानों में भारी नाराजगी थी। 27 जनवरी 1987 को शामली के करमूखेड़ी बिजलीघर पर हजारों किसानों ने धरना शुरू कर दिया। प्रशासन ने आंदोलन खत्म कराने की कोशिश की, लेकिन किसान डटे रहे। बाद में पुलिस फायरिंग में दो किसानों की मौत हो गई। इस घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। बाबा टिकैत ने मृत किसानों के शव उठाने से इनकार कर दिया और उनके सम्मान में बड़ा जनआंदोलन खड़ा कर दिया। यही वह आंदोलन था, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर किसान नेता के रूप में स्थापित कर दिया। बाबा टिकैत ने 1986 में भारतीय किसान यूनियन का गठन किया। खास बात यह रही कि उन्होंने संगठन को हमेशा सक्रिय राजनीति से दूर रखा। उनका मानना था कि किसान आंदोलन किसी पार्टी का मोहरा नहीं बनना चाहिए। सिसौली में हुई महापंचायत में सभी जातियों और समुदायों के किसानों को एक मंच पर लाकर उन्होंने सामाजिक एकता का संदेश दिया। बिजली दरों में बढ़ोतरी के खिलाफ जब पश्चिमी यूपी के किसान लामबंद हुए तो सिसौली में बड़ी महापंचायत हुई। किसानों की एकजुटता इतनी मजबूत थी कि तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को खुद गांव पहुंचकर किसानों से बातचीत करनी पड़ी। यह उस दौर में किसान शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण माना गया। UP News
बाबा टिकैत केवल किसान आंदोलनों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने ग्रामीण समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ भी आवाज उठाई। दहेज प्रथा, नशाखोरी, मृत्यु भोज और भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ उन्होंने कई सर्वखाप पंचायतें आयोजित कीं। उनका मानना था कि मजबूत समाज ही मजबूत किसान आंदोलन की नींव बन सकता है। 15 मई 2011 को बाबा टिकैत का निधन हो गया, लेकिन किसानों के हक की लड़ाई में उनकी आवाज आज भी उतनी ही प्रासंगिक मानी जाती है। भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में उनका नाम हमेशा उस नेता के रूप में याद किया जाएगा, जिसने गांव की चौपाल को दिल्ली की सत्ता तक पहुंचा दिया। UP News
विज्ञापन