उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ सालों से मंडल तथा कमंडल के मुकाबले की बजाय ‘‘मंडल + कमंडल” की राजनीति चल रही थी। इस बार वर्ष-2027 में ‘‘मंडल + कमंडल” की बजाय मंडल तथा कमंडल का बड़ा मुकाबला होगा।

UP News : उत्तर प्रदेश में एक बार फिर मंडल तथा कमंडल का बड़ा मुकाबला होगा। उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव वर्ष-2027 में होने हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 से एक साल पहले ही चुनाव का रणक्षेत्र सजना शुरू हो गया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 में मंडल तथा कमंडल का बड़ा मुकाबला होगा। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ सालों से मंडल तथा कमंडल के मुकाबले की बजाय ‘‘मंडल + कमंडल” की राजनीति चल रही थी। इस बार वर्ष-2027 में ‘‘मंडल + कमंडल” की बजाय मंडल तथा कमंडल का बड़ा मुकाबला होगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वालों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति ने करवट बदल ली है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित तथा अल्पसंख्यक यानि PDA का फार्मूला बनाकर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे दी है। उत्तर प्रदेश में PDA यानि पिछड़ावर्ग, दलित वर्ग तथा अल्पसंख्यक वर्ग की संख्या को जोड़ लिया जाए तो यह संख्या 80 प्रतिशत से भी अधिक बैठती है। उत्तर प्रदेश में जीत की हैट्रिक बनाने के लिए आतुर भारतीय जनता पार्टी के पास PDA की एक काट है। भाजपा केवल हिन्दुत्व के प्रचार-प्रसार से हिन्दू मतदाताओं को एकजुट करके PDA को मात दे सकती है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 में मंडल (PDA) तथा कमंडल (हिन्दुत्व) का बड़ा मुकाबला होना तय माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति को पूरी तरह समझने वालों का कहना है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का PDA वाला फार्मूला उत्तर प्रदेश की राजनीति का गेम चेंजर साबित हो सकता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का PDA वाला फार्मूला यदि सफल साबित हो गया तो उत्तर प्रदेश में भाजपा के विजय रथ को रोककर समाजवादी पार्टी प्रदेश में सरकार बना सकती है। अखिलेश यादव के फार्मूले को भाजपा तथा RSS मिलकर हिन्दुत्व के एजेंडे से ही विफल कर सकते हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा तथा RSS ने हिन्दुत्व के एजेंडे को धार देना शुरू कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए भाजपा तथा आरएसएस.(RSS) ने हिन्दुत्व के प्रचार प्रसार का अभियान तेज कर दिया है। इस अभियान के तहत उत्तर प्रदेश के प्रत्येक शहर तथा कस्बे में हिन्दू सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई गई है। इसी के साथ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में विराट हिन्दू सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा की गई है। यें सभी आयोजन भाजपा के संरक्षण की भूमिका निभाने वाले आरएसएस (RSS)के शताब्दी वर्ष के नाम पर आयोजित किए जा रहे हैं। भाजपा तथा आरएसएस(RSS) का मानना है कि हिन्दुत्व का एजेंडा उत्तर प्रदेश की 80 प्रतिशत आबादी को प्रभावित करने वाला एजेंडा बनकर प्रदेश में भाजपा की सरकार तीसरी बार बनाने में सार्थक भूमिका निभाएगा। आएसएस... तथा भाजपा अभी से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 में भाजपा की सरकार बनने के प्रति आश्वस्त नजर आ रहे हैं। आरएसएस(RSS) तथा भाजपा को पता है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता गंवाने का अर्थ यह होगा कि वर्ष-2029 के लोकसभा चुनाव में देश की सत्ता भी गंवानी पड़ सकती है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 में मंडल तथा कमंडल का बड़ा मुकाबला होना तय माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में मंडल तथा कमंडल की राजनीति का इतिहास बहुत ही पुराना है। उत्तर प्रदेश में जाति आधारित राजनीति (मंडल)की शुरूआत की बात करें तो यह दौर वर्ष-1970 में शुरू हुआ था। वर्ष-1970 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुए समाजवादी चिंतक तथा नेता राम मनोहर लोहिया ने प्रदेश में पिछड़ी जातियों को एकजुट करने का अभियान शुरू किया था। मजेदार बात यह है कि राम मनोहर लोहिया खुद अगड़ी जाति (वैश्य समाज) से आते थे। राम मनोहर लोहिया ने उत्तर प्रदेश से लेकर देश भर में पिछड़ी जातियों के आरक्षण के लिए बड़े-बड़े आंदोलन चलाए। इन आंदोलनों का असर यह हुआ कि वर्ष-1979 में भारत सरकार ने पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने की व्यवस्था करने के लिए समाजवादी नेता बिदेश्वरी प्रसाद मंडल के नेतृत्व में आयोग का गठन कर दिया। इस आयोग का नाम मंडल आयोग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश कर दी सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए। यह आरक्षण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को मिल रहे 22.5 प्रतिशत आरक्षण से अलग हो। हालांकि जब तक मंडल आयोग (Mandal Commission) अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपता तब तक केंद्र में सत्ता बदल गई। केंद्र की कांग्रेसी सरकार ने यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी।
मंडल का इतिहास आगे बढ़ा तथा आया 1989-90 का दौर। तब भी उत्तर प्रदेश से ही कांग्रेस के एक बड़े नेता होते थे विश्वनाथ प्रताप सिंह (vp singh) प्रधानमंत्री राजीव गांधी(rajiv gandhi) की सरकार में मंत्री रहे। लेकिन इसी सरकार के आखिरी दौर में राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) से खफा होकर कांग्रेस से अलग रास्ते चल दिए. फिर जब 1989 में लोकसभा चुनाव हुए, तो उसमें कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई। तमाम दूसरे दलों के सहयोग से, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी शामिल थी, केंद्र में सरकार बनाई. वीपी सिंह प्रधानमंत्री (VP Singh) बने और 1990 में उन्होंने मंडल आयोग (Mandal Commission) की सिफारिशें लागू करने की मंजूरी दे दी। यह विशुद्ध जाति-आधारित या मंडल की राजनीति की औपचारिक शुरुआत का दौर कहा जा सकता है। उत्तर प्रदेश सहित देश में उस वक्त वीपी सिंह की सरकार के खिलाफ आंदोलन हुए थे। इन्हें ‘आरक्षण-विरोधी आंदोलन’ कहा गया। इस आंदोलन की वजह से वीपी की सरकार भी चली गई। लेकिन उत्तर प्रदेश सहित तमाम राज्यों के अन्य पिछड़े (OBC) और क्षेत्रीय नेता पूरे दमखम से उभर आए. इनमें उत्तर प्रदेश से सबसे बड़ा नाम मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) का रहा, जो तब मुख्यमंत्री पद तक पहुंच चुके थे। उन्होंने 1992 में अपनी अलग समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) बना ली। लगभग इसी दौर में,जब मंडल आयोग की सुगबुगाहट शुरू हुई और उससे जुड़े घटनाक्रम चले, तो उत्तर प्रदेश के दलित नेता कांशीराम (Dalit leader Kanshiram) ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) बना ली थी। इसके माध्यम से अनुसूचित जातियों को लामबंद करने का काम किया जा रहा था. हालांकि आगे जब मायावती (Mayawati) के हाथ में बसपा की कमान आई तो उन्होंने महसूस किया कि राज्य की सिर्फ 20 प्रतिशत अनुसूचित जातियों की मदद से पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच सकती। इसलिए उन्होंने फिर अन्य पिछड़ों (OBC) भी अपने साथ जोडऩा शुरू कर दिया।
जब समाजवादी नेता अन्य पिछड़ों की राजनीति कर रहे थे, तभी 1989-90 के दौर में ही भाजपा (BJP) ने अयोध्या में राम मंदिर के लिए आंदोलन (Ram Mandir Movement) को हवा दी थी. यानी ‘कमंडल’ की राजनीति. चूंकि केंद्र की सत्ता तक पहुंचने के लिए उत्तर प्रदेश में असर बढ़ाना जरूरी होता है, इसलिए. इस आंदोलन को 1990 में तब सबसे ज्यादा उभार मिला, जब अयोध्या में कारसेवकों को रोकने के लिए तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने सुरक्षा बलों को गोली चलाने का आदेश दिया। इससे मुलायम सिंह अपने यादव पिछड़े वर्गों के साथ ही मुस्लिम समुदाय के चहेते हो गए। और इधर भाजपा को हिंदू समुदाय को अपने पक्ष में एकजुट करने का आधार भी मिला। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी मंडल का प्रतीक तथा भाजपा कमंडल का प्रतीक बन गई।
उत्तर प्रदेश में मंडल के बढ़ते प्रभाव के कारण भाजपा (BJP) को भी जल्द ही यह अहसास हो गया कि सिर्फ धार्मिक आंदोलन आधारित राजनीति लंबे समय का समाधान नहीं है. इसलिए उसने ‘कमंडल+मंडल’ का समीकरण बिठाया. उत्तर प्रदेश में मंदिर आंदोलन का प्रमुख चेहरा कल्याण सिंह को बनाया, जो अन्य पिछडे वर्ग (OBC) की ‘लोध’ जाति से ताल्लुक रखते थे. उसका प्रयोग सफल रहा. कल्याण सिंह (Kalyan Singh) की अगुवाई में भाजपा ने 1991 में पूरे बहुमत से सरकार बनाई। हालांकि वह दौर प्रयोगवादी राजनीति का था, इसलिए 1992 में अयोध्या का विवादित ढांचा ढहते ही उनकी सरकार भी चली गई. लेकिन इसी ‘कमंडल+मंडल’ ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव तथा 2017 तथा 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को जो बंपर जीत दिलाई, उसने हर पार्टी को सोचने पर मजबूर कर दिया। हर पार्टी ‘मंडल+कमंडल’ का सूत्र आजमाने लगी। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के द्वारा शुरू किए गए पीडीए के प्रयोग ने उत्तर प्रदेश को एक बार फिर ‘‘मंडल तथा कमंडल’’ के सीधे मुकाबले के रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है। विश्लेषकों का दावा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में उत्तर प्रदेश में मंडल तथा कमंडल का बड़ा मुकाबला होगा। UP News