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शहर की एकीकृत टाउनशिप योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करीब 15 साल पहले शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य जहां एक ओर आलीशान विला और कोठियां विकसित करना था, वहीं आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए हजारों किफायती आवास भी बनाने थे।

UP News : शहर की एकीकृत टाउनशिप योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करीब 15 साल पहले शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य जहां एक ओर आलीशान विला और कोठियां विकसित करना था, वहीं आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए हजारों किफायती आवास भी बनाने थे। लेकिन हकीकत यह है कि अमीरों के लिए बने आवास वर्षों पहले तैयार होकर आवंटित हो चुके हैं, जबकि गरीब परिवार आज भी अपने आशियाने का इंतजार कर रहे हैं। योजना के तहत सात बिल्डरों को कुल 3,469 ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) और 3,469 एलआईजी (निम्न आय वर्ग) आवास बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। निर्धारित समय के अनुसार इन परियोजनाओं को वर्ष 2016 तक पूरा कर लिया जाना था, लेकिन एक दशक बीतने के बाद भी हजारों फ्लैट अधूरे पड़े हैं।
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उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक केवल 1,709 ईडब्ल्यूएस और 1,552 एलआईजी आवासों का निर्माण ही पूरा हो सका है। दूसरी ओर, इसी परियोजना में विकसित किए गए महंगे विला और कोठियां वर्षों पहले तैयार होकर खरीदारों को सौंप दी गईं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन किफायती आवासों के लिए आवेदन करने वाले हजारों लोगों ने योजना पर भरोसा करते हुए पहले 10 प्रतिशत राशि जमा की और बाद में निर्धारित किश्तों में पूरा भुगतान भी कर दिया। इसके बावजूद उन्हें अब तक मकान नहीं मिल सका है। इससे आवंटियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
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यह मुद्दा विधानसभा तक पहुंच चुका है। हाल ही में इस मामले पर पूछे गए सवाल के जवाब में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के उपाध्यक्ष नंद किशोर कलाल ने कहा कि बिल्डरों को हर हाल में ईडब्ल्यूएस और एलआईजी आवासों का निर्माण पूरा करना होगा। इसके लिए उनसे समयबद्ध कार्ययोजना और परफॉर्मेंस गारंटी मांगी जाएगी। यदि निर्धारित समयसीमा का पालन नहीं हुआ तो संबंधित बिल्डरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। हालांकि आवंटी इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि वर्षों से उन्हें केवल वादे और भरोसे ही मिल रहे हैं, जबकि उनका सपना अब भी अधूरा है। ऐसे में यह परियोजना एक बार फिर इस बहस को जन्म दे रही है कि विकास योजनाओं में गरीबों के हितों को आखिर कितनी प्राथमिकता दी जाती है।
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